जब कलम जागी

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जब कलम जागी“श्वेता बेटा, जल्दी उठो। सुबह के नौ बज गए हैं और तुम अभी तक सो रही हो। जल्दी तैयार हो जाओ, आज हमें मंदिर जाना है।”रसोई से आती स्नेहभरी आवाज़ सुनकर श्वेता ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं। यह आवाज़ उसकी माँ सरोज की थी।“माँ, आज मंदिर क्यों जाना है? क्या आज कोई विशेष दिन है?” श्वेता ने उनींदी आँखों से पूछा।सरोज मुस्कुराईं और बोलीं, “अरे, आज तुम्हारा अठारहवाँ जन्मदिन है। इस शुभ दिन की शुरुआत भगवान के दर्शन से करेंगे।”श्वेता हल्की-सी मुस्कुराई और माँ के पास आकर बोली, “माँ, मेरे लिए तो आप ही भगवान से कम नहीं हैं।