सुनीता ने बात को टालते हुए कहा… जैसा तुम सोच रही हो, वैसा कुछ भी नहीं है। देखो… ये नीला आसमान जो शाम ढलते ढलते कितने रंगों को खुद में गढ़ लेता है। ये पंछी जो अपने अपने घोंसले में वापस लौट रहे हैं। कहीं दूर से आती, ये सुहावनी हवाएं जो मन को सुकून दे रही हैपता है ये हमारी दिन भर की थकान अपने साथ उड़ा ले जाती है।नैना जानती थी, उसकी बुआ उसकी बात को टाल रही है।वो मुस्कुराई… बुआ आप बात को बदलो मत। कोई बात तो है? जिसे आप सब से छुपा कर जी रही हैं। बुआ बताओ