महानगर की फिज़ा में जो अजीब सी घुटन थी, वह राघवन के लिए अब उतनी अनजानी नहीं रही थी। अपनी पहाड़ों की यात्रा के बाद जब वह वापस लौटा, तो शहर उसे पहले जैसा नहीं लगा। या शायद, यह शहर वैसा ही था, बस उसे देखने वाली आँखें अब पूरी तरह बदल चुकी थीं। राघवन का वापस आना कोई विजय का प्रतीक नहीं था, और न ही यह किसी पुरानी दास्तान का सुखद अंत था। यह था एक टूटे हुए इंसान का, अपने ही मलबे के बीच फिर से खड़े होने का एक थका हुआ प्रयास।उसके घर का दरवाजा जब