कंधों पर आसमान

उस दिन घर का आंगन लोगों से भरा हुआ था, लेकिन बाईस साल के कबीर की दुनिया पूरी तरह वीरान हो चुकी थी। उसके पिता, राघवजी, महज उनचास साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से अचानक दुनिया छोड़ गए थे। उनचास साल कोई जाने की उम्र नहीं होती। राघवजी घर के मजबूत स्तंभ थे; एक छोटी सी कपड़े की दुकान, सिर पर पुराना कर्ज़, मां का गिरता स्वास्थ्य और कॉलेज में पढ़ती छोटी बहन अनन्या—सब कुछ उनके ही कंधों पर टिका था।पिता की चिता की आग ठंडी भी नहीं हुई थी कि कबीर के सामने जिम्मेदारियों का पहाड़