भाग २ — माँ का बेटा या पत्नी का पति?सुबह के सात बजे थे।मिहिर की आँखें खुलीं, लेकिन नींद पूरी नहीं हुई थी।पिछली रात के शब्द अभी भी उसके कानों में गूँज रहे थे—“तुम सबके लिए हो मिहिर… लेकिन मेरे लिए कब हो?”वह धीरे से बिस्तर से उठा।निशा अभी सो रही थी।मिहिर ने उसकी तरफ देखा।कल उसकी आँखों में आए आँसू उसे याद आ गए।वह कुछ कहने ही वाला था कि बाहर से माँ की आवाज़ आई।“मिहिर, उठ गया?”“हाँ माँ।”“बेटा, जरा यहाँ आना।”मिहिर कमरे से बाहर आया।माँ सोफे पर बैठी थीं।“क्या हुआ?”“कुछ नहीं। कल डॉक्टर ने कहा है कि दवा