राखी सिर्फ धागा नहीं होती

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सावन की रिमझिम फहारों के बीच जब बाज़ार रंग-बिरंगी राखियों से सजे थे, तब राघव अपनी किताबों की अलमारी के सबसे निचले दराज में एक पुरानी लकड़ी की डिब्बी ढूंढ रहा था।उस डिब्बी में कोई कीमती ज़ेवर नहीं था—बस एक सूती धागे की हल्की सी फीकी पड़ चुकी राखी और एक हाथ से लिखा हुआ मुड़ा-तुड़ा कागज़ का टुकड़ा था।राघव और अनन्या सगे भाई-बहन नहीं थे। शहर के एक अनाथ आश्रम में, जहाँ राघव पाँच साल का और अनन्या तीन साल की थी, दोनों पहली बार मिले थे। अनन्या का इस दुनिया में कोई नहीं था, और राघव भी तन्हा