भाग 15 — अब खुद के लिएसुबह के सात बजे थे।मिहिर अपनी छोटी-सी मेज पर बैठा था।सामने लैपटॉप खुला था।कुछ जरूरी कागज एक तरफ रखे थे और दूसरी तरफ चाय का कप।अब उसकी जिंदगी पहले जैसी नहीं रही थी।ऑफिस की भागदौड़ खत्म हो चुकी थी।हर महीने आने वाली तय सैलरी खत्म हो चुकी थी।लेकिन उसके भीतर एक नई शुरुआत जन्म ले रही थी।उसने पिछले कुछ दिनों में बहुत सोचा था।वह हमेशा दूसरों के सपने पूरे करने में लगा रहा।पिता की उम्मीदें।भाई की जरूरतें।पत्नी की इच्छाएँ।बच्चों का भविष्य।लेकिन उसने कभी खुद से नहीं पूछा था—“मिहिर, तू क्या चाहता है?”आज वह खुद