Devil की दास्तान - 47

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( सुबह का वक्त। हल्की धूप खिड़की से छनकर कमरे में गिर रही है। हवा में सन्नाटा है। सिया धीरे-धीरे बिस्तर से उठती है। उसके चेहरे पर रात भर की बेचैनी साफ दिखती है।)(टेबल पर रखी पुरानी डायरी — करण की डायरी — खुली पड़ी है। सिया उसके पन्ने पलट रही है।)सिया (धीरे, खुद से बुदबुदाते हुए) बोली - “‘मैंने उसे बचाने के लिए झूठ कहा... वो अब वो नहीं रही जो थी।’इसका मतलब क्या है?कौन सी ‘वो’... कौन सा झूठ?”(वो गहराई से सोच में डूबी है। पन्ने दर पन्ने पढ़ती है — पर हर लाइन उसके लिए रहस्य बनती जाती