( सुबह का समय। हल्की धूप पर्दों से छनकर कमरे में आ रही है। करण और सिया एक ही बिस्तर पर हैं। बाहर से पंछियों की आवाज़ आ रही है, पर कमरे के अंदर अब भी एक अजीब-सी खामोशी पसरी है।)(सिया की आँखें धीरे-धीरे खुलती हैं। सामने करण अब भी गहरी नींद में है। उसके चेहरे पर शांति है — लेकिन वही चेहरा कल रात सिया के लिए डर और रहस्य का प्रतीक बन गया था।)सिया (धीरे से, खुद से) बोली - “शायद अब… मैं सब जान लूँ…”(वो धीरे-धीरे करवट बदलती है और तकिए के नीचे से डायरी निकालने की कोशिश