राहें - 30

  • 486
  • 147

एक थी रेनूरेनू अपनी परिचित ऑटी सावित्री के घर पहुँची, दरवाजाखटखटाते हुये वह थोड़ा झिझक रही थी, फिर भी हिम्मत करकेउसने दरवाजा खटखटाया, दरवाजा सावित्री ऑटी ने ही खोला-रेनू को दरवाजे पर देखकर वे भी स्तंभित रह गई ,फिर बोली-आओ बेटी ,अन्दर आओ और उन्होनें रेनू को अन्दर ड्राइंग रूम मेंबैठाया - पूछा - कैसे हो बेटे-?बैठते हुये रेनू बोली - ठीक हूँ ऑटी ।सावित्री ने पूछा - अभी कहाँ रह रही है? इधर आना नहीं होताक्या -? तेरा कोई हाल चाल भी पता नहीं चला - रेनू बोली - ऑटीमकान की खोज में ही मैं आपके पास आई हँ,