चुगली

      शनैः शनैः गतिरोध बढ़ता जा रहा था। गतिरोध तन का नहीं, बल्कि गतिरोध मन का बढ़ता जा रहा था। वो तो शिथील सी चाल से चल रहा था लेकिन उसकी इच्छाएं मानो विमान पर सवार हो। शारिरिक परेशानी की तो बात बिल्कूल भी नहीं है, लेकिन मानसिक परेशानी की बात जरूर है। अब गबरू की चहलकदमी में तेजी आयी और उसके कदम मुड़ चले रामखेलावन के घर की तरफ। वही रामखेलावन जिसके साथ भरे बाजार में कहासुनी हो गयी थी। यह घटना बहूत से लोगों के सामन हुई थी। गजब का तमाशा हुआ था। तमाशा दखने वालों