(सुबह की हल्की धूप परदे से झाँक रही है। कमरे में सन्नाटा है।सिया अब भी नींद में है, चेहरा शांत लेकिन आँखों के नीचे हल्के डार्क सर्कल। कबीर उसके पास आता है, हाथ में फाइलें हैं।)कबीर (धीरे से) बोला - “सिया... उठो। आज ऑफिस जाना है।”(सिया आधी नींद में कराहती है, कंबल ओढ़े हुए जवाब देती है।)सिया (नींद में) बोली - “क्या? मैं भी ऑफिस जाती हूँ क्या?”(कबीर हँसता नहीं, बस हल्के से मुस्कुराता है।)कबीर (थोड़ा सख्त लहजे में) बोला - “और क्या... खुद को कोई राजकुमारी समझ रखा है क्या?चलो, उठो — देर हो जाएगी।”(सिया धीरे-धीरे उठती है, बाल बिखरे हुए हैं।