काफ़ी है...

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कोई ऐसी शाम, जिसकी हर किसी को चाह होती है… जैसे रोज़ के तनाव भरे जीवन से कहीं दूर जाके, समंदर किनारे, लहरों के पास, तेज़ चलती हवा में उँगलियाँ फैलाके, पसंद के कपड़ों में उड़ते बालों में और हवा में घुली हुई आसमानी महक के साथ सूर्य के ढलने के बाद वाला थोड़ा केसरी थोड़ा लाल आसमान देखने की चाह।और आज बिल्कुल वैसी ही शाम थी, एकदम वैसी जैसी श्रवण ने सोची थी।लहरें उसके पैरों को चूमके वापस जा रही थीं, सूर्यास्त के बाद वाली लाली उसके सफेद चेहरे पर पड़ रही थी…उसके अंदर की वो सारी थकान जिसने