सृष्टि - 3

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सृष्टि ज़ब वेद से मिलती है तब उनका सामना बिल्कुल अच्छा नहीं था लेकिन उनके दोस्तों से मिलकर लगा कि ये इतने बुरे भी नही है सृष्टि उस दिन का ख़तम कर अपने घर चली जाती है            मध्य रात्रि मे हल्की हल्की चाँद कि रोशनी फैली हुइ थी जिसमे हल्का हल्का उजाला हो रखा था यहां सृष्टि अपने छत वाले रूम कि बालकनी मे बैठी बैठी चाँद को निहार रही थी उसके हाथ मे एक लॉकेट था जो तारें कि आकृति का था उसे निहारती और चाँद कि और देखती, वो उसके किसी खास व्यक्ति