अधूरी डायरी या पूरी महोब्बत

शहर के एक छोटे, शांत और बेहद खूबसूरत कैफ़े के कोने वाली टेबल माहिरा की सबसे पसंदीदा जगह थी। वह रोज़ दोपहर ढलते ही वहाँ आकर बैठ जाती, खिड़की से बाहर दौड़ती दुनिया को देखती और अपनी नीली डायरी में खोई रहती थी। वह अपने दिल की हर उस बात को, जिसे वह कभी किसी से ज़ुबान से कह नहीं पाती थी, शायरी के रूप में उस डायरी के पन्नों पर बिखेर देती थी। उसी कैफ़े में, बस दो टेबल छोड़कर, कबीर भी रोज़ आकर बैठता था। कबीर पिछले एक पूरे महीने से माहिरा को चुपचाप नोटिस कर रहा था।