सत्या का सच

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अरव मेरी ज़िंदगी का पहला और आखिरी पता था। हम दोनों एक ही गली में पले-बढ़े। मुझे आज भी याद है कि जब हमने नन्हें कदमों से चलना सीखा था, तब से अरव मेरा हाथ पकड़कर चलता था। बचपन में जब गली के बाकी बच्चे खेल-खेल में मुझे रुला देते, तब अरव अपनी छोटी-छोटी मुट्ठियाँ भींचकर मेरे आगे ढाल बनकर खड़ा हो जाता।वह कहता: "सत्या, तुम्हें कभी रोना नहीं है... मैं हूँ ना!"बड़े होते-होते हमारी दोस्ती कब प्यार में बदल गई, मुझे पता ही नहीं चला। स्कूल के दिनों में जब मेरी सहेलियाँ हीरो-हीरोइन की बातें करतीं, तब मेरी आँख