धड़कने दिल की - 5

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ऑटो रिक्शा बांद्रा की संकरी, गीली गलियों में हिचकोले खाते हुए आगे बढ़ रहा था। बाहर की धुंधली पीली स्ट्रीटलाइट्स की रोशनी ऑटो के काले पर्दे पर नाच रही थी, लेकिन आदित्य के भीतर जैसे पूरी दुनिया की रोशनी एक झटके में बुझ चुकी थी। उसके कानों में एक ही नाम किसी जहरीले तीर की तरह बार-बार चुभ रहा था—**प्रोफेसर वी. के. जोशी**।उसके बड़े चाचा।वही चाचा जिन्होंने सात साल की उम्र में पहली बार आदित्य की नन्हीं उंगलियों के बीच वह पुराना विंटेज कैमरा थमाया था। वही इंसान, जो हर रविवार की सुबह घर की बालकनी में बैठकर शेक्सपियर और