अध्याय:48कर्तव्य के प्रति अटूट समर्पण और स्व-प्रेरणाकी शक्ति सच्ची सेवा वह है जो बिना किसी आर्थिक लाभ की इच्छा के, केवल मानवता और समाज के कल्याण के लिए की जाए। जब कोईव्यक्ति स्व-प्रेरणा (Self-Motivation) से किसी कार्य को अपना जीवनसमर्पित कर देता है, तो वह समाज के लिए एक प्रेरणापुंज बन जाता है। महाराष्ट्र की ७४ वर्षीय अनुराधा कुलकर्णी जी की कहानी इसी निस्वार्थसमर्पण की एक अद्भुत मिसाल है।अनुराधा जी पिछले ३० वर्षों से अधिक समय से महाराष्ट्र की सड़कों परट्रैफिक संभालने का कार्य कर रही हैं। उनके इस सफर की शुरुआत एकव्यक्तिगत त्रासदी से हुई—३० साल पहले उनके पति, जो स्वयं ट्रैफिकपुलिस में थे, उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद अनुराधा जी नेउनके अधूरे कार्यों और समाज के प्रति उनके उत्तरदायित्व को अपनालिया। जब पुलिस विभाग ने उन्हें पूरी निष्ठा के साथ ट्रैफिक संभालतेदेखा, तो उन्हें एक सीटी (Whistle) प्रदान की, जो आज भी उनके पास है।अनुराधा जी के सेवा कार्यों की विशेषताएँ:• पुलिस की सहायक: वे केवल ट्रैफिक ही नहीं संभालतीं, बल्कि उनकेसूचना तंत्र पर पुलिस को इतना भरोसा है कि उनकी एक कॉल परपुलिस तत्काल कार्रवाई करती है। उनके सहयोग से मुंबई पुलिस नेकई अपराधियों और चोरों को पकड़ा है।• प्राथमिक चिकित्सा (First Aid): उनके पास हमेशा एक फर्स्ट एडकिट होती है, जिससे वे सड़क दुर्घटना में घायल होने वाले लोगों कीतुरंत सहायता करती हैं।• निस्वार्थ भाव: वे यह सारा कार्य बिना किसी वेतन या आर्थिक लाभके, केवल अपने सिद्धांतों और समाज के प्रति प्रेम के कारण करतीहैं।यह घटना हमें सिखाती है कि जब आप स्व-प्रेरित होकर किसी कार्य कोअपनी पूरी शक्ति और ईमानदारी से करते हैं, तो सम्मान, प्रसिद्धि औरपहचान स्वतः ही आपके कदम चूमने लगती है। ७४ वर्ष की आयु में भीउनका जोश और सक्रियता उन युवाओं के लिए एक सबक है जो छोटी-छोटी बाधाओं से हार मान लेते हैं। सीख / नैतिक संदेशइस अध्याय से हमें यह महान शिक्षा मिलती है कि 'कर्म ही पूजा है'। यदिआपके भीतर समाज के लिए कुछ करने का जज्बा है, तो उम्र या साधनकभी आपकी राह में बाधा नहीं बन सकते। अनुराधा कुलकर्णी जी हमेंसिखाती हैं कि जीवन की व्यक्तिगत त्रासदियों को भी सामाजिक सेवा कीऊर्जा में बदला जा सकता है। हमें अपने जीवन में ऐसे कार्यों को चुननाचाहिए जो हमारे सिद्धांतों के अनुरूप हों और जिनसे समाज का भला होसके। जब आप निस्वार्थ भाव से समर्पित होकर कार्य करते हैं, तो आपकेवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक संस्था बन जाते हैं। अध्याय:49धड़कन योजना—वंचित बच्चों के लिए जीवनका वरदान समाज के प्रति संवेदनशीलता और निस्वार्थ सेवा ही किसीसंस्थान या व्यक्ति को महान बनाती है। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर इलाके मेंस्थित SECL (South Eastern Coalfields Limited) ने इसी सेवा भावको चरितार्थ करते हुए 'नन्हा सा दिल' और 'धड़कन' योजना की शुरुआतकी है। यह योजना उन गरीब और आदिवासी परिवारों के लिए एक उम्मीदकी किरण बनकर उभरी है, जिनके बच्चों के दिल में जन्मजात बीमारियाँ हैंऔर जिनके पास इलाज के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं।योजना का स्वरूप और विस्तार:SECL ने कोल इंडिया लिमिटेड की 'नन्हा सा दिल' योजना के अंतर्गतदुर्गम ग्रामीण इलाकों जैसे सरगुजा, बलरामपुर, अंबिकापुर, बैकुंठपुर औरमहेंद्रगढ़ में विशेष चिकित्सा शिविर आयोजित किए। इन शिविरों कामुख्य उद्देश्य उन बच्चों की पहचान करना है जो हृदय संबंधी गंभीर रोगों सेजूझ रहे हैं। रायपुर के श्री साईं हॉस्पिटल के सहयोग से SECL इन बच्चोंकी मुफ्त हार्ट सर्जरी (Heart Surgery) करवा रहा है।इस पहल की सफलता और प्रभाव:• जीवनदान: अब तक लगभग १२० बच्चों की सफल हार्ट सर्जरी की जाचुकी है, जिससे वे अब एक स्वस्थ जीवन जी रहे हैं।• लक्ष्य: SECL का लक्ष्य लगभग ३०० बच्चों की मुफ्त हार्ट सर्जरीकरने का है, ताकि कोई भी बच्चा संसाधनों के अभाव में इलाज सेवंचित न रहे।• अभिभावकों के लिए संबल: दूरदराज के आदिवासी इलाकों में रहनेवाले माता-पिता के पास इतना धन नहीं होता कि वे निजीअस्पतालों में हार्ट सर्जरी का भारी-भरकम खर्च उठा सकें। उनकेलिए SECL की यह योजना किसी ईश्वरीय वरदान से कम नहीं है।यह योजना दर्शाती है कि यदि कोई जिम्मेदार संस्था या नागरिक ठान ले, तो वह समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति के जीवन में भीबड़ा बदलाव ला सकता है। एक स्वस्थ बच्चा ही भविष्य के समृद्ध समाजकी नींव होता है, और इन नन्हे दिलों की धड़कनों को सहेजना मानवता कासबसे बड़ा कार्य है। सीख / नैतिक संदेशइस अध्याय से हमें यह महान शिक्षा मिलती है कि 'यदि ईश्वर ने आपकोदेने की शक्ति दी है, तो समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व को कभी न भूलें'। चाहे आप एक बड़े संगठन के मालिक हों या एक जिम्मेदारनागरिक, हमें वंचितों और जरूरतमंदों की सहायता के लिए सदैव तत्पररहना चाहिए। SECL की 'धड़कन' योजना हमें सिखाती है कि सच्चीप्रगति वही है जिसमें समाज का हर तबका, विशेषकर बच्चे, स्वस्थ औरसुरक्षित महसूस करें। परोपकार ही वह धर्म है जो हमें वास्तव में मानवबनाता है। अध्याय:50प्रतिज्ञा की शक्ति और त्रिपुरा की साक्षरताविजय किसी भी समाज की उन्नति का सबसे बड़ा आधार 'शिक्षा' है। जब एक पूरा राज्य साक्षरता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एकजुट होजाता है, तो इतिहास रचा जाता है। त्रिपुरा राज्य ने हाल ही में २३ जून कोस्वयं को 'पूर्ण साक्षर राज्य' घोषित कर एक ऐसी ही ऐतिहासिक उपलब्धिहासिल की है। यह उपलब्धि केवल सरकारी आंकड़ों की जीत नहीं है, बल्कि यह हजारों लोगों के सामूहिक साहस, सामर्थ्य और दृढ़ प्रतिज्ञा कापरिणाम है।साक्षरता का सफर और आंकड़े:२०११ की जनगणना के अनुसार, त्रिपुरा की साक्षरता दर ८७.२२% थी। भारत में किसी भी राज्य को पूर्ण साक्षर तब माना जाता है जब उसकीसाक्षरता दर ९५% से ऊपर पहुँच जाए। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिएत्रिपुरा सरकार ने ९,००० साक्षरता केंद्र खोले, लेकिन इस मिशन कोअसली गति दी वहां के २२,२२८ स्वयंसेवकों (Volunteers) ने।निस्वार्थ सेवा और समर्पण:२०२२ में शुरू हुए इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इन२२,२२८ स्वयंसेवकों ने बिना किसी वेतन के, केवल स्व-प्रेरणा से राज्य कोशिक्षित करने की प्रतिज्ञा ली। इन युवाओं और वालंटियर्स ने:• आंगनबाड़ी, प्राथमिक विद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों के साथमिलकर काम किया।• घर-घर जाकर लोगों को बांग्ला, अंग्रेजी और वहां की स्थानीयभाषाओं में पढ़ाना शुरू किया।• दुर्गम इलाकों में पहुँचकर शिक्षा की अलख जगाई।इनके इसी अथक परिश्रम का परिणाम है कि आज त्रिपुरा, केरल औरमिजोरम के बाद भारत का तीसरा सबसे बड़ा पूर्ण साक्षर राज्य बन गयाहै।यह गौरवपूर्ण उपलब्धि हमें सिखाती है कि जब उद्देश्य पवित्र हो और लोगउसे अपनी प्रतिज्ञा बना लें, तो बड़े से बड़े लक्ष्य को प्राप्त करना सुलभ होजाता है। उन वालंटियर्स ने सिद्ध कर दिया कि समाज सेवा के लिए धन सेअधिक 'दृढ़ इच्छाशक्ति' और 'नियत' की आवश्यकता होती है। सीख / नैतिक संदेशइस अध्याय से हमें यह महान शिक्षा मिलती है कि 'प्रतिज्ञा में ही सफलताका बीज छिपा होता है'। यदि हम किसी कार्य को पूरा करने की ठान लेंऔर उसमें निस्वार्थ भाव से जुट जाएँ, तो कोई भी बाधा हमें रोक नहींसकती। त्रिपुरा की यह कहानी युवाओं को प्रेरित करती है कि वे अपनीऊर्जा का उपयोग समाज के निर्माण में करें। साक्षरता केवल अक्षरों काज्ञान नहीं है, बल्कि यह अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का मार्ग है। हमेंभी अपने आसपास के लोगों को शिक्षित और जागरूक करने का संकल्पलेना चाहिए। अध्याय:51संस्कृति का हस्तांतरण—पर्यावरण औरसंस्कारों की अनूठी परंपरा मेघालय की राजधानी शिलांग से लगभग ९० किलोमीटर दूरस्थित एक छोटा सा गांव है—मावलिननॉन्ग। यह गांव विश्व भर में अपनीस्वच्छता और सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है। 'डिस्कवर इंडिया' ने २००३ में इसेएशिया का सबसे स्वच्छ गांव घोषित किया था, और २००५ में भारतसरकार ने भी इसे देश के सबसे स्वच्छ गांव का गौरव प्रदान किया। लेकिन इस स्वच्छता के पीछे कोई आधुनिक तकनीक या बाहरी मशीनोंका हाथ नहीं है, बल्कि इसके पीछे वहां के बुजुर्गों द्वारा दी गई 'संस्कारोंकी विरासत' है।स्वच्छता का रहस्य—संस्कारों की जड़ें: मावलिननॉन्ग के सरपंच बताते हैंकि वहां के बुजुर्ग एक विशेष परंपरा का पालन करते हैं। वे गांव के बच्चोंको एक साथ लेकर पूरे गांव में घुमाने निकलते हैं। इस भ्रमण के दौरान, बुजुर्ग बच्चों को अपनी स्थानीय 'खासी' (Khasi) भाषा में लोक कथाएँ, कहानियाँ और अपने पूर्वजों का साहित्य सुनाते हैं।इन लोक कथाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये सीधे तौर परपर्यावरण और प्रकृति से जुड़ी होती हैं। कहानियों के माध्यम से बच्चों कोयह सिखाया जाता है कि पेड़, पौधे, नदियाँ और जंगल केवल संसाधननहीं हैं, बल्कि उनके जीवन का अभिन्न अंग हैं। बचपन से ही कहानियों केरूप में मिले ये संस्कार बच्चों के मन में प्रकृति के प्रति गहरा प्रेम औरसम्मान पैदा कर देते हैं। यही कारण है कि स्वच्छता वहां के लोगों केस्वभाव और रक्त में समाई हुई है।यह गांव इस बात का जीवंत उदाहरण है कि यदि हम अपनी संस्कृति औरलोक कथाओं के माध्यम से अगली पीढ़ी को सही दिशा दें, तो हम बड़े सेबड़े सामाजिक परिवर्तन ला सकते हैं। वहां के बुजुर्गों ने सिद्ध कर दिया किपर्यावरण का संरक्षण केवल कानून बनाकर नहीं, बल्कि बच्चों के भीतर'लगाव' पैदा करके किया जा सकता है। सीख / नैतिक संदेशइस अध्याय से हमें यह महान शिक्षा मिलती है कि 'संस्कृति का हस्तांतरणही समाज का वास्तविक धन है'। हमें भी अपने बच्चों को पंचतंत्र जैसीकहानियों और अपनी जड़ों से जुड़ी लोक कथाओं के माध्यम से यहसिखाना चाहिए कि प्रकृति की रक्षा करना हमारा मौलिक कर्तव्य है। जबहम अपनी संतानों को पर्यावरण के प्रति सजग और संवेदनशील बनाते हैं, तभी हम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुंदर और सुरक्षित पृथ्वीछोड़कर जा सकते हैं। संस्कारों की नींव पर ही एक स्वच्छ और स्वस्थराष्ट्र का निर्माण संभव है।