सपनों की ट्रेन

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मज़ेदार कहानियों की पुस्तक पढ़ते हुए शिवांगी की नज़र चमकती हुई लाल रंग की ट्रेन के चित्र पर ठहर गईIउसने सोचा-"कितना अच्छा होता अगर मेरे पास अपनी एक ट्रेन होती जो मुझे दूर देश तक ले जाती और खूब मज़े करातीI"तभी कमरे में गुलाबी रंग का धुआँ भर गया और उस धुएं के बीच सुर्ख लाल रंग की ट्रेन खड़ी चमचमा रही थीIशिवांगी की आँखें आश्चर्य से फ़ैल गईI वो कुछ बोल पाती तभी ट्रेन बोली-"छुक छुक...छुक छुक ..."शिवांगी ने खुद को चिकोटी काटी और चीखी-"अरे, ये तो सपना नहीं है, ट्रेन तो सच में हैI"ट्रेन ने पूछा-बोली—"क्या तुम मेरे