कल की बात

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कल की बातलेखक: विजय शर्मा एरी(लगभग 2000 शब्द)रात के बारह बज रहे थे। कमरे में सिर्फ दीवार घड़ी की टिक-टिक और पंखे की धीमी आवाज़ थी। मैं अपने पुराने लकड़ी के डेस्क पर बैठा था। सामने एक खुली डायरी पड़ी थी, जिसका पहला पन्ना अभी भी खाली था। कल का दिन इतना भारी पड़ गया था कि नींद आना नामुमकिन लग रहा था।कल की बात है…सुबह जब मैं उठा तो आसमान में बादल छाए हुए थे। बरसात का मौसम था, पर बारिश अभी रुकी हुई थी। घर के आँगन में माँ तुलसी के पौधे को पानी दे रही थीं। पिताजी