*हिस्सा 1: लौट आना (1972)*1972. बनारस में गंगा अब भी वैसी ही बहती थी, पर घाट पर अब बिजली के बल्ब लग गए थे।लाइब्रेरी की सीढ़ियाँ अब और घिस गई थीं। रवि के बाल पूरे सफेद हो गए थे। चश्मा मोटा हो गया था। पर एक चीज अभी भी वैसी थी — मंगलवार और शुक्रवार, 4 बजे। वो मेज़ अभी भी खाली रखता था। सफाई वाला कहता "बाबू जी, ये मेज़ कोई इस्तेमाल नहीं करता, हटा दूँ?" रवि कहता "रहने दो। आदत है।"एक शुक्रवार, 4 बजकर 5 मिनट पर घंटी बजी।दरवाजे पर एक लड़की खड़ी थी। लंबी, हाथ में झोला,