[63]संध्या आरती सम्पन्न हो गई। वत्सर ने ढलते सूर्य की साक्षी में कृष्ण के लिए बाँसुरी बजाई। सरिता – शैल उसे एक चित्त से सुनते रहे। जब वत्सर ने वंशी वादन सम्पन्न किया तो शैल का चित्त भंग हुआ। वास्तव की धरातल पर वह आ गया। किन्तु सरिता अभी भी आँखें बंद कर स्थिर बैठी थी। जैसे अभी भी उसे बाँसुरी के सुर सुनाई दे रहे हो, वह उसमें एकाग्र होकर खोई हुई हो। शैल ने उसकी अवस्था भंग करने की इच्छा से सरिता को जगाना चाहा किन्तु वत्सर ने उसे रोक लिया। शैल रुक गया, सरिता की समाधि के