सफ़र ज़िन्दगी का

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कुछ सफ़र मंज़िल तक पहुँचने के लिए नहीं, बल्कि ख़ुद को पहचानने के लिए तय किए जाते हैं...सुबह के पाँच बजे थे। आसमान पर हल्की-हल्की लाली फैलने लगी थी। रेलवे स्टेशन की पुरानी बेंच पर बैठा माधव सामने से गुजरती रेलगाड़ियों को देख रहा था। हाथ में एक छोटा-सा बैग, जेब में कुछ मुड़े-तुड़े नोट और आँखों में ऐसे सपने, जिन्हें पूरा करने की उम्र तो थी, मगर अब उन्हें पूरा करने का भरोसा कहीं खो गया था।उसने अपनी कलाई पर बँधी घड़ी देखी। वक्त तो आगे बढ़ रहा था, लेकिन उसे लग रहा था जैसे उसकी ज़िन्दगी बरसों से