टूटता हुआ मन

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(अहंकार से आत्मबोध तक की कथा)रमेश घोष एक प्रतिष्ठित आईआईटी इंजीनियर था।तेज बुद्धि, आधुनिक सोच और तर्कशील स्वभाव—वह उन लोगों में से था जो जाति, वर्ण और परंपराओं को पुरानी और निरर्थक मानते थे।कॉलेज के दिनों में उसकी मुलाकात फरजाना से हुई—एक आत्मविश्वासी, स्वतंत्र विचारों वाली युवती।विचारों का मेल हुआ… और वही मेल धीरे-धीरे प्रेम में बदल गया।परिवारों ने विरोध किया—धर्म, जाति, समाज—हर तर्क सामने आया।रमेश के पिता—एक प्रतिष्ठित सेवानिवृत्त शिक्षक—बांकुड़ा जिले के घोष समाज में अत्यंत सम्मानित व्यक्ति थे।

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टूटता हुआ मन - भाग 1

टूटता हुआ मन भाग :-1(अहंकार से आत्मबोध तक की कथा)रमेश घोष एक प्रतिष्ठित आईआईटी इंजीनियर था।तेज बुद्धि, आधुनिक सोच तर्कशील स्वभाव—वह उन लोगों में से था जो जाति, वर्ण और परंपराओं को पुरानी और निरर्थक मानते थे।कॉलेज के दिनों में उसकी मुलाकात फरजाना से हुई—एक आत्मविश्वासी, स्वतंत्र विचारों वाली युवती।विचारों का मेल हुआ… और वही मेल धीरे-धीरे प्रेम में बदल गया।परिवारों ने विरोध किया—धर्म, जाति, समाज—हर तर्क सामने आया।रमेश के पिता—एक प्रतिष्ठित सेवानिवृत्त शिक्षक—बांकुड़ा जिले के घोष समाज में अत्यंत ...Read More

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टूटता हुआ मन - भाग 2

रमेश अपनी पत्नी फरजाना की बेवफाई से भीतर ही भीतर टूट चुका था। कभी हँसी, विश्वास और अपनत्व से उसका घर अब अजीब-सी खामोशी का बसेरा बन गया था। डॉक्टर सुहैल से फरजाना की बढ़ती निकटता ने उसके जीवन की सारी खुशियाँ जैसे छीन ली थीं।दोनों प्रतिष्ठित डॉक्टर थे। धन, सम्मान, प्रभाव और समाज में ऊँचा स्थान—सब कुछ उनके पास था। रमेश एक साधारण इंजीनियर था। उसके पास न सत्ता थी, न पहुँच और न ही ऐसा कोई साधन जिससे वह इस संबंध के विरुद्ध खुलकर खड़ा हो पाता। कानून, समाज और परिस्थितियाँ—तीनों उसे असहाय बना रही थीं।लेकिन उससे ...Read More

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टूटता हुआ मन - भाग 3

उस दिन विद्यालय का सभागार खचाखच भरा था। शांतनु मंच पर खड़ा था। उसकी आवाज़ में न कृत्रिमता थी, प्रदर्शन—केवल अपने परिवार के प्रति सहज श्रद्धा थी।"मैंने अपने दादू को कभी देखा नहीं। वे एक साधारण शिक्षक थे, पर उनके विचार असाधारण थे। पूरे बांकुड़ा जिले में उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध जो अलख जगाई, उसने हजारों बेटियों को नया जीवन दिया। लोग उनका नाम सम्मान से लेते हैं। उन्हें अनेक पुरस्कार मिले, पर मेरी माँ कहती हैं कि उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार लोगों का विश्वास था।माँ मुझे बचपन से एक ही बात कहती थीं—'बेटा, अपने मम्मी-पापा ...Read More