कुछ लोग हमारे जीवन में कभी नहीं आते।वे हमारे घरों की चौखट नहीं लाँघते, हमारी उँगलियों को नहीं छूते, हमारे साथ तस्वीरों में नहीं दिखते।फिर भी, एक दिन जब हम अपनी स्मृतियों की अलमारी खोलते हैं, तो पाते हैं कि सबसे अधिक जगह उन्हीं लोगों ने घेर रखी है।समर को यह बात बहुत देर से समझ आई थी।इतनी देर से कि जब तक समझ आई, तब तक उस समझ का कोई उपयोग नहीं बचा था।उस सुबह भी वह अपनी मेज़ पर झुका बैठा था।जनवरी की धूप खिड़की से छनकर कमरे में आ रही थी |
जिस जीवन में तुम थे - 1
कुछ लोग हमारे जीवन में कभी नहीं आते।वे हमारे घरों की चौखट नहीं लाँघते, हमारी उँगलियों को नहीं छूते, साथ तस्वीरों में नहीं दिखते।फिर भी, एक दिन जब हम अपनी स्मृतियों की अलमारी खोलते हैं, तो पाते हैं कि सबसे अधिक जगह उन्हीं लोगों ने घेर रखी है।समर को यह बात बहुत देर से समझ आई थी।इतनी देर से कि जब तक समझ आई, तब तक उस समझ का कोई उपयोग नहीं बचा था।उस सुबह भी वह अपनी मेज़ पर झुका बैठा था।जनवरी की धूप खिड़की से छनकर कमरे में आ रही थी और पुराने काग़ज़ों पर बिखर रही ...Read More
जिस जीवन में तुम थे - 2
किसी-किसी रात समय सो जाता है।घड़ी चलती रहती है, रात आगे बढ़ती रहती है, लेकिन भीतर कहीं सब कुछ जाता है।उस रात समर के साथ भी यही हुआ।पत्र लिखने के बाद वह देर तक मेज़ पर बैठा रहा। कमरे में पीली रोशनी थी और उसके सामने खुली डायरी।वह कई वर्षों से लिख रहा था।लेख, टिप्पणियाँ, किताबों पर समीक्षाएँ, अधूरे उपन्यास।लेकिन उस रात जो लिखा गया था, वह साहित्य नहीं था।वह किसी ऐसे व्यक्ति से संवाद था जो अस्तित्व में भी हो सकता था और नहीं भी।अगली सुबह उसने वह पत्र एक भूरे लिफाफे में रखा।ऊपर केवल दो शब्द लिखे,"उसके ...Read More
जिस जीवन में तुम थे - 3
अप्रैल की शुरुआत में शहर पर एक अजीब-सी धूप उतरती है।न वह सर्दियों की कोमल धूप होती है, न की कठोर।बस एक ऐसी धूप, जो पुरानी यादों की तरह कंधों पर आकर बैठ जाती है।समर ने उस दिन तीसरा पत्र लिखा।लेकिन उससे पहले उसने कई दिनों तक कुछ नहीं लिखा था।उसे डर लगने लगा था।डर इस बात का नहीं कि वह अजनबी स्त्री उत्तर देना बंद कर देगी।डर इस बात का था कि वह उत्तर देती रहेगी।मनुष्य जिन चीज़ों का अभ्यस्त हो जाता है, उनके खोने का भय भी उसी अनुपात में बढ़ता जाता है।और समर को प्रतीक्षा की ...Read More
जिस जीवन में तुम थे - 4
कुछ दिनों बाद समर को एक और पत्र मिला।इस बार कागज़ के साथ एक पुरानी तस्वीर थी।लेकिन तस्वीर में चेहरा नहीं था।सिर्फ़ एक रेलवे स्टेशन,खाली प्लेटफ़ॉर्म,दूर जाती हुई पटरियाँ।पीछे धुँधला सा आकाश।पत्र में लिखा था"मैंने यह तस्वीर पच्चीस वर्ष पहले खींची थी।मुझे हमेशा लगता रहा कि जीवन रेलवे स्टेशन जैसा है।कुछ लोग हमारे पास बैठते हैं।कुछ देर बातें करते हैं।फिर अपनी ट्रेन आने पर चले जाते हैं।हम उन्हें रोक नहीं सकते।हम केवल उनकी अनुपस्थिति के साथ जीना सीख सकते हैं।"समर ने उस तस्वीर को बहुत देर तक देखा।फिर उसने धीरे से उसे अपनी डायरी में रख लिया।उसी गुलमोहर के ...Read More
जिस जीवन में तुम थे - 5
सितंबर की शुरुआत थी।वर्ष का वह समय जब पेड़ हरे तो रहते हैं, लेकिन उनकी हरियाली में एक थकान लगती है।जैसे मौसम को पहले से पता हो कि पतझड़ दूर नहीं।समर ने उस दिन एक अजीब बात महसूस की।उसे अन्विता का इंतज़ार पहले की तरह नहीं सताता था।अब वह उसके साथ रहने लगा था।उसकी अनुपस्थिति में भी।उसके मौन में भी।उसकी कल्पना में भी।और यही वह क्षण था जहाँ प्रेम अपने सबसे ख़तरनाक रूप में प्रवेश करता है।जब कोई व्यक्ति वास्तविकता से निकलकर हमारी आंतरिक दुनिया का हिस्सा बन जाता है।उस दिन अन्विता का पत्र असामान्य रूप से लंबा था।समर ...Read More