कुछ दिनों बाद समर को एक और पत्र मिला।
इस बार कागज़ के साथ एक पुरानी तस्वीर थी।
लेकिन तस्वीर में कोई चेहरा नहीं था।
सिर्फ़ एक रेलवे स्टेशन,खाली प्लेटफ़ॉर्म,दूर जाती हुई पटरियाँ।
पीछे धुँधला सा आकाश।
पत्र में लिखा था
"मैंने यह तस्वीर पच्चीस वर्ष पहले खींची थी।
मुझे हमेशा लगता रहा कि जीवन रेलवे स्टेशन जैसा है।
कुछ लोग हमारे पास बैठते हैं।
कुछ देर बातें करते हैं।
फिर अपनी ट्रेन आने पर चले जाते हैं।
हम उन्हें रोक नहीं सकते।
हम केवल उनकी अनुपस्थिति के साथ जीना सीख सकते हैं।"
समर ने उस तस्वीर को बहुत देर तक देखा।
फिर उसने धीरे से उसे अपनी डायरी में रख लिया।
उसी गुलमोहर के फूल के साथ।
उस रात उसने एक पत्र लिखा...
और भेजा नहीं।
उसमें केवल एक वाक्य था,
"मैं तुम्हें देखना चाहता हूँ।"
उसने वह कागज़ फाड़ दिया।
फिर दूसरा लिखा,फिर फाड़ दिया।
फिर तीसरा.....और अंततः कुछ भी नहीं भेजा।
क्योंकि उसे डर था।डर कि यदि वे मिल गए,
तो शायद वह जादू टूट जाएगा जिसने अब तक उनके बीच सब कुछ बचाकर रखा था।
लेकिन उसे यह नहीं मालूम था कि दूसरी ओर बैठी अन्विता भी उसी रात लगभग वही शब्द लिख रही थी......
"क्या होगा अगर हम मिल लें?"
और फिर वह भी वह कागज़ फाड़ रही थी।
कभी-कभी नियति दो लोगों को एक ही विचार देती है।
लेकिन उन्हें एक-दूसरे तक पहुँचने नहीं देती।
और शायद यही प्रेम की सबसे पुरानी त्रासदी है।
उस रात समर ने सोने से पहले डायरी में लिखा,
"मैं तुम्हें देखना नहीं चाहता।मैं केवल यह जानना चाहता हूँ कि तुम सचमुच हो।
क्योंकि अगर तुम नहीं हुईं,तो मेरे जीवन का सबसे सुंदर हिस्सा भी सच नहीं होगा।"
और उसे नहीं पता था...
कि बहुत जल्द उसे अन्विता के बारे में एक ऐसा सत्य पता चलने वाला है,
जो उसके प्रेम को और गहरा भी करेगा,और असंभव भी।
जुलाई की एक उदास दोपहर थी।आकाश में बादल थे, लेकिन बारिश नहीं।जैसे रो लेने की इच्छा हो और आँसू साथ न दे रहे हों।
उस दिन समर को जो पत्र मिला, वह अब तक के सभी पत्रों से अलग था।
लिफ़ाफ़ा खोलते ही उसे लगा जैसे काग़ज़ नहीं, किसी का वर्षों से दबा हुआ मौन उसके हाथों में आ गया हो।
भीतर केवल एक वाक्य लिखा था,"मैं विवाहित हूँ।"
बस इतना सा.....न कोई भूमिका,न कोई स्पष्टीकरण,न कोई भावुकता,केवल एक तथ्य.......जो निर्दयी, निर्विकार और पूर्ण था।
समर बहुत देर तक उस काग़ज़ को देखता रहा।
उसे आश्चर्य हुआ कि उसे दर्द तो हुआ, लेकिन वैसा नहीं जैसा उसने सोचा था।
क्योंकि सच तो यह था कि वह भीतर ही भीतर इस संभावना को पहले से जानता था।
एक स्त्री, जो जीवन के बारे में इतनी परिपक्वता से लिखती है...
जिसकी स्मृतियों में पच्चीस वर्ष पुराने रेलवे स्टेशन हैं...
जिसके शब्दों में इतना लंबा अकेलापन है...
वह शायद युवती नहीं हो सकती थी।
वह जीवन के कई मौसम पार कर चुकी थी।
लेकिन पत्र समाप्त नहीं हुआ था।
नीचे कुछ और पंक्तियाँ थीं।
"यह बात तुम्हें बहुत पहले बता देनी चाहिए थी।
लेकिन कुछ सत्य ऐसे होते हैं जिन्हें हम स्वीकार करने में स्वयं देर कर देते हैं।
मैं विवाहित हूँ।और कई वर्षों से हूँ।"
समर आगे पढ़ता गया।
"मुझे नहीं पता विवाह को असफल कहना उचित होगा या नहीं।
क्योंकि उसमें कोई हिंसा नहीं थी।
कोई क्रूरता नहीं थी।
कोई बड़ा अपराध नहीं था।
बस प्रेम नहीं था।"
समर की उँगलियाँ काग़ज़ पर स्थिर हो गईं।
बस प्रेम नहीं था।
कितना विचित्र है......?
मनुष्य कभी-कभी बड़े दुख सह लेता है।
लेकिन प्रेम की अनुपस्थिति नहीं सह पाता।
पत्र में आगे लिखा था,
"हमने एक-दूसरे को सम्मान दिया,साथ निभाया।
समाज की दृष्टि में एक अच्छा जीवन जिया।
लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिनमें सब कुछ होता है।
सिवाय उस चीज़ के जिसके लिए रिश्ता बनाया गया था।"समर ने आँखें बंद कर लीं।
उसे लगा जैसे वह पहली बार अन्विता की दुनिया के दरवाज़े पर खड़ा है।
एक ऐसे घर के बाहर...जहाँ सब कुछ व्यवस्थित है।
और फिर भी सब कुछ रिक्त है।
पत्र का अंतिम हिस्सा पढ़ते समय उसके भीतर कुछ टूटता चला गया।
"तुम्हें यह जानना चाहिए।
क्योंकि मैं नहीं चाहती कि तुम किसी भ्रम में रहो।
मैं तुम्हारे जीवन में देर से आई हूँ।
और शायद गलत समय पर आई हूँ।"
फिर एक खाली जगह थी।
और उसके नीचे........
"कभी-कभी मुझे लगता है कि हम दोनों एक-दूसरे से उस उम्र में मिले हैं,
जब जीवन हमें नए सपने देखने की अनुमति नहीं देता।"
उस रात समर ने कोई उत्तर नहीं लिखा।
वह केवल अपने कमरे में बैठा रहा।
घंटों......मौन..... और टूटा बिखरा सा,
उसे लगा जैसे उसके भीतर दो आदमी बैठे हैं।
एक कह रहा था,"यहीं रुक जाओ।"
दूसरा कह रहा था,"अब लौटना संभव नहीं।"
रात के लगभग दो बजे उसने डायरी खोली।और आज पहली बार अन्विता का नाम लिखने की कोशिश की।
फिर रुक गया।उसे उसका नाम नहीं पता था।
कितनी अजीब बात थी?
वह उस स्त्री से प्रेम करने लगा था...
जिसका नाम तक नहीं जानता था।
अगले दिन उसने उत्तर भेजा।जो बहुत छोटा था।
"मुझे यह जानकर दुख नहीं हुआ कि तुम विवाहित हो।मुझे यह जानकर दुख हुआ कि तुम अकेली हो।"
जब अन्विता ने वह उत्तर पढ़ा, तो कई मिनट तक काग़ज़ को देखती रही।फिर उसने आँखें बंद कर लीं।
क्योंकि वर्षों बाद किसी ने उसके विवाह के बारे में नहीं...उसके अकेलेपन के बारे में पूछा था।
उस शाम वह अपने घर की बालकनी में बैठी रही।
नीचे सड़क पर लोग आ-जा रहे थे।
घर के भीतर उसके पति किसी ऑनलाइन बैठक में व्यस्त थे।
कमरे में उनकी आवाज़ गूँज रही थी।
वह आवाज़ जिसे वह वर्षों से सुनती आ रही थी।और फिर भी जिसके भीतर उसके लिए कोई जगह नहीं थी।
उसे याद नहीं था कि आख़िरी बार किसी ने उससे यह कब पूछा था?"तुम कैसी हो?"सचमुच कैसी हो?
औपचारिकता में नहीं,आदत में नहीं,बल्कि दिल से।
उस रात उसने समर के लिए एक लंबा पत्र शुरू किया।
लेकिन पूरा नहीं कर पाई।
क्योंकि कुछ स्वीकारोक्तियाँ लिखते समय हाथ काँपने लगते हैं।
उसने केवल इतना लिखा.....
"मैं तुम्हें एक बात बताना चाहती हूँ।
लेकिन डरती हूँ।
क्योंकि उसके बाद शायद तुम मुझे पहले जैसा नहीं देख पाओगे।"
और उस वक्त पहली बार...कई वर्षों में पहली बार...अन्विता रोई।जी भर कर रोई......धीरे-धीरे,बिना आवाज़ के।
जैसे कोई स्त्री किसी व्यक्ति के लिए नहीं...अपने भीतर मर चुकी किसी संभावना के लिए रोती है।
उधर समर अपनी खिड़की के पास बैठा था।उसे नहीं पता था कि अन्विता क्यों रो रही है?रो रही है या वहम है.....
लेकिन उस रात उसे अजीब बेचैनी थी।
जैसे किसी बहुत दूर बैठे व्यक्ति का दुख हवा के रास्ते उसके कमरे तक पहुँच गया हो।
और शायद प्रेम का यही सबसे रहस्यमय रूप है,
जब दो लोग एक-दूसरे को छुए बिना भी एक-दूसरे के दर्द में शामिल होने लगते हैं।
अगस्त की शुरुआत में बारिश कम हो गई थी।पेड़ों पर धूल लौटने लगी थी।आकाश फिर से अपने सामान्य रंग में आने लगा था।लेकिन समर के भीतर कुछ बदल गया था।अब वह पत्रों की प्रतीक्षा नहीं करता था।
वह उनके बीच के मौन की भी प्रतीक्षा करता था।
क्योंकि उसने समझ लिया था कि अन्विता की सबसे बड़ी सच्चाइयाँ उसके शब्दों में नहीं, उसकी चुप्पियों में छिपी हैं।
उसके पिछले पत्र को आए हुए लगभग पंद्रह दिन हो चुके थे।
पंद्रह दिन........
और इतने दिनों में इस बार समर को डर लगा।कहीं वह बीमार तो नहीं?कहीं शहर से बाहर तो नहीं?
कहीं...उसने आगे सोचना बंद कर दिया।
प्रेम में कल्पना अक्सर दुख की सबसे बड़ी निर्माता होती है।
सोलहवें दिन पत्र आया,लिफ़ाफ़ा पहले जैसा ही था।
सादा......और बिना किसी पहचान के।लेकिन लिखावट थोड़ी काँपती हुई थी।
समर ने पत्र खोला।
और पढ़ना शुरू किया।
"तुमने लिखा था कि तुम्हें यह जानकर दुख नहीं हुआ कि मैं विवाहित हूँ।
तुम्हें यह जानकर दुख हुआ कि मैं अकेली हूँ।
उस दिन बहुत देर तक मैं यही सोचती रही कि किसी अजनबी ने मुझे मुझसे बेहतर कैसे पढ़ लिया।"
समर मुस्कराया नहीं।कुछ वाक्य मुस्कुराने के लिए नहीं होते।
वे केवल दिल में उतर जाते हैं।
पत्र आगे बढ़ा।
"मैं तुम्हें एक बात बताना चाहती हूँ।
शायद इसलिए नहीं कि तुम्हें जानने का अधिकार है।
बल्कि इसलिए कि अब इस बात का बोझ अकेले उठाना कठिन हो गया है।"
समर का दिल थोड़ा तेज़ धड़कने लगा।
उसे लगा, वह उसी बंद कमरे के दरवाज़े तक पहुँच गया है जिसके सामने अन्विता महीनों से खड़ी थी।
"मुझे एक बीमारी है।"
बस चार शब्द.........
लेकिन उन चार शब्दों ने कमरे की हवा बदल दी।
समर बहुत देर तक आगे नहीं पढ़ सका।
उसने पत्र मेज़ पर रख दिया।
खिड़की तक गया।
वापस आया।
फिर पढ़ना शुरू किया।
"डरने वाली बात नहीं है।
कम-से-कम डॉक्टर यही कहते हैं।
मैं अभी जीवित हूँ।
सामान्य जीवन जी रही हूँ।
हँसती भी हूँ,काम भी करती हूँ।
लेकिन अब मैं समय को पहले की तरह नहीं देखती।"
समर ने महसूस किया कि उसके हाथ ठंडे हो रहे हैं।
"कुछ वर्ष पहले जब मुझे इसके बारे में पता चला था, तब सबसे पहले मैंने मृत्यु के बारे में नहीं सोचा।
मैंने उन चीज़ों के बारे में सोचा जो अधूरी रह जाएँगी।
वे किताबें जो पढ़नी थीं।
वे शहर जो देखने थे।
वे पत्र जो लिखने थे।"
पत्र में एक लंबा खाली स्थान था।
फिर लिखा था,
"और शायद इसी कारण मैं तुमसे बात कर रही हूँ।
क्योंकि पहली बार मुझे लगा कि कोई मुझे मेरे शेष बचे हुए समय से नहीं,मुझसे प्रेम करता है।"
समर की आँखें उसी पंक्ति पर टिक गईं।
वह जानता था कि उसे अभी यह नहीं सोचना चाहिए।
लेकिन उसके भीतर एक आवाज़ बार-बार कह रही थी,
"मुझसे प्रेम करता है।"
क्या यह अनजाने में लिखा गया वाक्य था?या स्वीकारोक्ति?
या केवल एक थकी हुई आत्मा का भरोसा?
पत्र समाप्त होने से पहले अन्विता ने एक और बात लिखी थी।
"मैं नहीं चाहती कि तुम मुझ पर दया करो।
दया मनुष्य को छोटा कर देती है।मैं केवल चाहती हूँ कि तुम सत्य जानो।क्योंकि कुछ संबंध झूठ पर नहीं टिकने चाहिए।"
उस रात समर ने कोई उत्तर नहीं लिखा।
वह पूरी रात जागता रहा।
कई बार उसने पत्र उठाया।
कई बार रखा।
कई बार सोचा कि वह कल से दुकान जाना बंद कर देगा।
अभी।
यहीं।
इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।
लेकिन प्रेम में देर होने का निर्णय अक्सर प्रेम से नहीं, भय से लिया जाता है।
और समर भयभीत था।
किसी बीमारी से नहीं।
किसी मृत्यु से नहीं।
वह भयभीत था इस संभावना से कि एक दिन उसे अन्विता के बिना जीना पड़ सकता है।
सुबह होने तक उसने केवल एक वाक्य लिखा।
बहुत देर तक उसे देखता रहा।
फिर लिफ़ाफ़े में रख दिया।
"मुझे तुम्हारी बीमारी से डर नहीं लगा।
मुझे उस जीवन से डर लगा जिसमें तुम नहीं होगी।"
जब अन्विता ने वह पत्र पढ़ा, तो बहुत देर तक खिड़की के सामने बैठी रही।
बाहर शाम उतर रही थी।
आकाश पर धूसर रंग फैल रहा था।
और वर्षों बाद उसे लगा कि कोई उसके भीतर के अँधेरे कमरे में आकर चुपचाप बैठ गया है।
बिना प्रश्न किए,बिना समाधान दिए,बिना यह कहे कि सब ठीक हो जाएगा।
क्योंकि कुछ दुख ठीक नहीं होते।वे केवल साझा हो जाते हैं।
और कई बार वही पर्याप्त होता है।
उस रात अन्विता ने अपनी डायरी खोली।
एक खाली पन्ने पर लिखा,
"अगर मैं उससे पहले मिली होती...
तो क्या मेरा जीवन अलग होता?"
उसने कुछ देर उस वाक्य को देखा।
फिर धीरे से डायरी बंद कर दी।
क्योंकि कुछ प्रश्नों के उत्तर नहीं होते।
सिर्फ़ उम्र भर चलने वाली प्रतिध्वनियाँ होती हैं।
और उसी रात...
बहुत दूर अपने कमरे में बैठा समर भी लगभग यही सोच रहा था,
"क्या सचमुच कुछ लोग हमें बहुत देर से मिलते हैं?
या हम उन्हें पहचानने में देर कर देते हैं?"
और उनका अध्याय समाप्त नहीं हुआ था।केवल रात हुई थी।
और उनकी कहानी में अब पहली बार प्रेम ने अपना नाम लिया था,इतना धीमे कि शायद दोनों ने ही उसे सुनने का साहस नहीं किया।