Jis Jivan me tum the - 5 in Hindi Classic Stories by SHREYA INDUSHREE books and stories PDF | जिस जीवन में तुम थे - 5

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जिस जीवन में तुम थे - 5

सितंबर की शुरुआत थी।
वर्ष का वह समय जब पेड़ हरे तो रहते हैं, लेकिन उनकी हरियाली में एक थकान उतरने लगती है।
जैसे मौसम को पहले से पता हो कि पतझड़ दूर नहीं।
समर ने उस दिन एक अजीब बात महसूस की।
उसे अन्विता का इंतज़ार पहले की तरह नहीं सताता था।
अब वह उसके साथ रहने लगा था।
उसकी अनुपस्थिति में भी।
उसके मौन में भी।
उसकी कल्पना में भी।
और यही वह क्षण था जहाँ प्रेम अपने सबसे ख़तरनाक रूप में प्रवेश करता है।
जब कोई व्यक्ति वास्तविकता से निकलकर हमारी आंतरिक दुनिया का हिस्सा बन जाता है।
उस दिन अन्विता का पत्र असामान्य रूप से लंबा था।
समर ने उसे खोला।
काग़ज़ पर कुछ जगहों पर स्याही फैली हुई थी।
मानो लिखते समय हाथ काँपे हों।
या शायद आँखें।
"समर,
आज पहली बार मैं तुम्हें तुम्हारे नाम से लिख रही हूँ।"
समर ठिठक गया,उसका नाम,इतने महीनों बाद।
उसे अचानक एहसास हुआ कि उसने भी कभी नहीं पूछा था कि वह उसे किस नाम से पुकारती है।
पत्र आगे बढ़ा......
"मैंने तुम्हारा नाम अपने भीतर कई बार दोहराया है।
शायद जितनी बार तुम्हारे पत्र पढ़े हैं, उससे भी अधिक।
कुछ नाम धीरे-धीरे हमारे अकेलेपन का हिस्सा बन जाते हैं।
तुम्हारा नाम मेरे लिए वैसा ही हो गया है।"
समर ने आँखें बंद कर लीं।
कभी-कभी एक साधारण वाक्य भी मनुष्य के वर्षों पुराने अकेलेपन को छू लेता है।
फिर पत्र अचानक गंभीर हो गया।
"मुझे लगता है कि हम दोनों एक ऐसे स्थान पर पहुँच गए हैं जहाँ हमें स्वयं से झूठ नहीं बोलना चाहिए।"
समर का दिल धड़क उठा।
"मैं नहीं जानती प्रेम क्या होता है?
शायद अब भी नहीं जानती।
लेकिन इतना जानती हूँ कि सुबह उठकर सबसे पहले तुम्हारे पत्र के बारे में सोचती हूँ।
कोई बात मुझे दुखी करती है तो तुम्हें लिखने का मन होता है।
कोई सुंदर चीज़ देखती हूँ तो उसे तुम्हारे साथ बाँटना चाहती हूँ।"
समर आगे पढ़ नहीं पाया।कुछ देर तक नहीं।उसने पत्र मेज़ पर रख दिया।
चेहरे पर हाथ रख लिए।क्योंकि वह जानता था,
यह वही स्वीकारोक्ति थी जिसका वे दोनों महीनों से चक्कर लगा रहे थे।
नाम लिए बिना,कहे बिना।बहुत देर बाद उसने शेष पढ़ा।
"अगर यही प्रेम है...
तो शायद मैं तुमसे प्रेम करती हूँ।"
कमरे में सन्नाटा था।
खिड़की के बाहर हवा थी।
कहीं दूर किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज़ थी।
लेकिन समर को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था।
कितना विचित्र है?
मनुष्य जिस वाक्य को सुनने की सबसे अधिक इच्छा करता है...
उसी वाक्य से सबसे अधिक डरता भी है।
पत्र के अंतिम हिस्से में लिखा था,
"और शायद इसी कारण मैं यह भी कह रही हूँ कि हमें मिलना नहीं चाहिए।"
समर के भीतर कुछ टूटकर गिरा।
"क्योंकि मैं उस चमत्कार को खोना नहीं चाहती जो हमारे बीच है।
मुझे डर है कि वास्तविक जीवन हमारे शब्दों जितना सुंदर नहीं होगा।
मुझे डर है कि एक दिन हम एक-दूसरे को देखकर निराश हो जाएँगे।
या इससे भी बुरा,
हमें एक-दूसरे की और अधिक आवश्यकता होने लगेगी।"
समर बहुत देर तक पत्र को देखता रहा।
फिर उसे समझ आया,
अन्विता मिलन से नहीं डर रही थी।
वह उसके बाद आने वाले बिछोह से डर रही थी।
उस रात उसने कोई उत्तर नहीं लिखा।
वह शहर के पुराने हिस्से में निकल गया।
उसी किताबों की दुकान तक,दुकान बंद थी,शटर गिरा हुआ,सड़क सुनसान।वह वहीं खड़ा रहा,काफी देर तक।
और अचानक उसके भीतर एक विचार आया।
इतना सरल कि उसने पहले कभी सोचा ही नहीं था।
अगर वे मिल सकते हैं, तो मिलते क्यों नहीं?
क्या सचमुच जीवन इतना शक्तिशाली है कि दो मनुष्यों को मिलने से रोक सके?
या वे स्वयं अपने भय के कैदी बन गए हैं?
उधर उसी रात अन्विता भी नहीं सोई।
उसने वह पत्र भेज दिया था जिसे वह महीनों से लिखना चाहती थी।
और अब उसे लग रहा था जैसे उसने अपनी आत्मा का एक हिस्सा किसी दूसरे व्यक्ति के पास भेज दिया हो।
उसने आईने में स्वयं को देखा।बालों में हल्की चाँदी उतर आई थी।
आँखों के नीचे थकान थी।
चेहरे पर समय की महीन रेखाएँ थीं।
और पहली बार उसने सोचा,अगर समर मुझे देखेगा तो क्या देखेगा?
एक स्त्री?एक अधूरा जीवन?या केवल वह व्यक्ति जिससे वह प्रेम करता है?
फिर अचानक उसके भीतर एक और भय उठा।पहले से बड़ा।
अगर समर मुझे देखकर भी प्रेम करता रहा तो?
क्योंकि तब बचना असंभव हो जाएगा।
उस रात समर ने डायरी में केवल एक वाक्य लिखा,
"प्रेम का सबसे दुखद समय वह नहीं होता जब वह समाप्त होता है।
प्रेम का सबसे दुखद समय वह होता है जब वह संभव हो जाता है।"
और शायद पहली बार...
उन दोनों को यह एहसास हुआ कि नियति ने उन्हें केवल मिलाया नहीं है।
वह उनसे कोई कीमत भी माँगने वाली है।और प्रेम कभी बिना कीमत के नहीं मिलता।


अक्टूबर की पहली सुबह थी।
पेड़ों से पत्ते अभी टूटने शुरू नहीं हुए थे, लेकिन हवा में पतझड़ की आहट थी।
समर ने कई दिनों से कोई पत्र नहीं लिखा था।
अन्विता ने भी नहीं।
उनके बीच इस बार शब्दों का नहीं, निर्णय का मौन था।
क्योंकि कुछ प्रश्नों के उत्तर लिखकर नहीं दिए जा सकते।
उन्हें जीना पड़ता है।
लगभग तीन सप्ताह बाद समर को एक पत्र मिला।
लिफ़ाफ़ा पहले जैसा ही था।
लेकिन भीतर केवल एक काग़ज़ नहीं था।
एक रेलवे टिकट भी थी।पुरानी,पीली पड़ चुकी।किसी बहुत पुराने सफ़र की।
पत्र में लिखा था,
"यह टिकट मैंने पच्चीस वर्ष से संभालकर रखी है।
जिस दिन मैं उससे आख़िरी बार मिली थी, उसी दिन की।"
समर ने पढ़ना जारी रखा।
"उस दिन मुझे लगा था कि दुख का भी एक अंत होता होगा।
लेकिन वर्षों बाद समझ आया कि कुछ दुख समाप्त नहीं होते।
वे केवल हमारे स्वभाव का हिस्सा बन जाते हैं।"
फिर एक लंबा विराम।
और उसके बाद........ अचंभित कर देने वाली बात थी।
"समर,
मैं तुमसे मिलना चाहती हूँ।"
उसका दिल जैसे एक धड़कन भूल गया।
"और शायद यही बात मुझे सबसे अधिक डरा रही है।"
समर ने पत्र नीचे रख दिया।
खिड़की तक गया।वापस आया।फिर पढ़ा।फिर रखा।
कुछ वाक्य ऐसे होते हैं जिन्हें मनुष्य बार-बार पढ़ता है ताकि विश्वास कर सके कि वे सचमुच लिखे गए हैं।
पत्र आगे कह रहा था,
"मुझे नहीं पता हमारे मिलने के बाद क्या बदलेगा?
शायद कुछ भी नहीं,शायद सब कुछ।
लेकिन अब मुझे यह जानना है कि उन शब्दों के पीछे बैठा हुआ मनुष्य कैसा है? जिसने मेरे सबसे अंधेरे दिनों को सहने योग्य बना दिया।"
उस रात समर ने पहली बार स्वयं को रोने दिया।किसी बड़े कारण से नहीं।किसी त्रासदी से नहीं।
बल्कि इसलिए कि जीवन ने बहुत देर बाद उसे एक संभावना दी थी।
लेकिन हर संभावना अपने साथ भय भी लाती है।
उसने उत्तर लिखा,
"मैं भी तुमसे मिलना चाहता हूँ।
शायद उस दिन से भी पहले से जब मैंने यह स्वीकार किया कि मैं तुमसे प्रेम करता हूँ।"
उसने कलम रोक ली,बहुत देर तक रुका रहा।
फिर आगे लिखा,
"लेकिन अगर हम मिलें...
तो क्या हम वही रह पाएँगे जो अभी हैं?"
उत्तर आने में केवल दो दिन लगे।
"नहीं।
हम वही नहीं रहेंगे।
कोई भी मनुष्य सच जान लेने के बाद वैसा नहीं रहता जैसा पहले था।"
समर मुस्कुराया।
यह उत्तर अन्विता जैसा ही था।निर्दयी रूप से ईमानदार।
फिर नीचे लिखा था,
"लेकिन क्या केवल इस डर से हमें सच से दूर रहना चाहिए?"
उस रात दोनों ने अलग-अलग शहर के दो कमरों में लगभग एक ही निर्णय लिया।वे मिलेंगे........

नवंबर के पहले रविवार को,दोपहर चार बजे।शहर के पुराने हिस्से की उसी किताबों की दुकान में।
जहाँ यह सब शुरू हुआ था।
निर्णय हो गया।इतना सरल......इतना ही कठिन।
और उसके बाद शुरू हुआ वह समय...
जिसके बारे में कोई प्रेम कहानी बात नहीं करती।
मिलने से पहले का दुःख।
समर हर सुबह उठता और सोचता,
अगर उसे मैं पसंद न आया तो?
अगर उसने मुझे किसी और तरह कल्पना किया हो?
अगर मेरी आवाज़ उसके मन की आवाज़ जैसी न निकली?
अगर...
उधर अन्विता आईने के सामने खड़ी रहती।
बहुत देर तक,
उस उम्र में नहीं जब स्त्रियाँ अपने सौंदर्य के प्रति सजग होती हैं।
उस उम्र में जब वे अपने बीते हुए समय के प्रति सजग हो जाती हैं।
वह अपनी आँखों के पास की महीन रेखाएँ देखती।अपने सफ़ेद होते बाल।और सोचती—
क्या प्रेम की भी कोई उम्र होती है?
लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न कोई और था।
क्या होगा अगर वह मुझे देखकर भी प्रेम करता रहा?
क्योंकि तब यह केवल एक सुंदर भ्रम नहीं रहेगा।
वह वास्तविकता बन जाएगा।
और वास्तविकता हमेशा अधिक पीड़ादायक होती है।
दिन बीतते गए।
अक्टूबर समाप्त होने लगा।
एक शाम समर को अन्विता का छोटा-सा पत्र मिला,शायद अब तक का सबसे छोटा।
"अगर उस दिन मैं रो दूँ...तो कृपया मुझे सांत्वना मत देना।"
बस इतना।
समर बहुत देर तक उस पंक्ति को देखता रहा।
और अचानक उसे महसूस हुआ,अन्विता मिलने से नहीं डर रही।
वह उस जीवन के शोक से डर रही है...
जो उन्हें मिल सकता था।
उसने उत्तर में केवल एक वाक्य भेजा,
"अगर तुम रोईं...तो मैं भी शायद चुप नहीं रह पाऊँगा।"
और फिर वह वक्त आ गया जब...दोनों ने दिन नहीं गिने।
उन्होंने घंटे गिनने शुरू कर दिए।
क्योंकि अब उनके बीच केवल पत्र नहीं थे।
एक तारीख़ थी,एक समय था,एक मिलने की जगह थी।
और नियति...
जो चुपचाप कहीं बैठी उनकी ओर देख रही थी।

वह स्त्री जो मेरे शब्दों में रहती हैं वह कैसी होगी?समर सोचों में था।
नवंबर का पहला रविवार।
दोपहर के चार बजने में अभी पंद्रह मिनट थे।
समर समय से बहुत पहले पहुँच गया था।
असल में वह दोपहर से ही वहाँ था।
पुरानी किताबों की दुकान के सामने वाली चाय की दुकान में बैठा।
बार-बार घड़ी देखता हुआ।
बार-बार सड़क की ओर देखता हुआ।
बार-बार स्वयं को समझाता हुआ कि वह शांत है।
जबकि वह बिल्कुल शांत नहीं था।
मनुष्य अपने जीवन में कई बार प्रतीक्षा करता है।
पर कुछ प्रतीक्षाएँ ऐसी होती हैं जिनमें पूरा जीवन सिमट आता है।
यह वैसी ही प्रतीक्षा थी।
चार बजने में पाँच मिनट थे।
फिर तीन....
फिर दो....समर दुकान के भीतर चला आया।
मोहनलाल जी आज भी अपनी पुरानी कुर्सी पर बैठे थे।
उम्र अब उनके कंधों पर साफ़ दिखाई देने लगी थी।
उन्होंने समर को देखा।हल्की मुस्कान दी।
शायद उन्हें बहुत कुछ पता था।शायद कुछ भी नहीं।
घड़ी ने चार बजाए।
समर का दिल इतनी तेज़ी से धड़क रहा था कि उसे लगा, दुकान में मौजूद हर व्यक्ति उसे सुन सकता है।
दरवाज़ा खुला,एक ग्राहक अंदर आया।
फिर दूसरा।
फिर एक बुज़ुर्ग सज्जन।
लेकिन वह नहीं।
चार बजकर दस मिनट।
समर ने स्वयं को समझाया,
शहर का ट्रैफ़िक...
कोई काम....
कोई देरी...
चार बजकर बीस मिनट।
अब उसके भीतर एक परिचित डर लौटने लगा।
वही डर जो हर प्रतीक्षा के साथ आता है।
चार बजकर पच्चीस मिनट।
और तभी...
दुकान का दरवाज़ा फिर खुला।
समर ने अनायास सिर उठाया।
एक स्त्री भीतर आई।
साधारण सूती साड़ी,कंधे तक आते बाल,आँखों पर हल्का चश्मा।चेहरे पर समय की महीन रेखाएँ।
और आँखों में...
एक ऐसी थकान जो केवल वर्षों के अकेलेपन से आती है।
वह सुंदर थी।
लेकिन उस तरह नहीं जिस तरह उपन्यास और कहानियां सुंदरता का वर्णन करते हैं।
वह सुंदर थी...
जैसे वर्षों तक बंद रहने के बाद खुली हुई कोई पुरानी किताब सुंदर होती है।
उसकी नज़रें दुकान में घूमीं।
फिर आकर समर पर ठहर गईं।
कुछ क्षण,केवल कुछ क्षण।
और उन कुछ क्षणों में दोनों ने एक-दूसरे को पहचान लिया।
न तस्वीरों से.....न परिचय से।
शायद उन हजारों शब्दों से...
जो महीनों से उनके बीच यात्रा कर रहे थे।
अन्विता धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ी।समर खड़ा हो गया।
और अचानक उसे एहसास हुआ कि उसके पास कहने के लिए कुछ नहीं है।
महीनों तक लिखने वाले दो लोग...उस क्षण पूरी तरह मौन थे।
अन्विता उसके सामने आकर रुक गई।
कुछ सेकंड........ बीते....
फिर बहुत धीरे से बोली,
"तुम सचमुच हो.....!"

बस इतना कहा कि समर के भीतर कुछ भर आया।
क्योंकि यही वाक्य वह भी महीनों से अपने भीतर दोहरा रहा था।
उसने मुस्कुराने की कोशिश की।
और कहा,
"मुझे भी यही लग रहा है।"
दोनों हल्का-सा हँसे।
और उसी क्षण...
महीनों का संकोच थोड़ा टूट गया।
वे दुकान के पीछे वाले छोटे कमरे में बैठ गए।
जहाँ पुरानी किताबों के ढेर लगे थे।
खिड़की से ढलती हुई धूप आ रही थी।
पहले कुछ मिनट वे केवल एक-दूसरे को देखते रहे।
जैसे दोनों अपनी कल्पना और वास्तविकता के बीच का अंतर समझने की कोशिश कर रहे हों।
फिर अन्विता ने कहा,
"तुम बिल्कुल वैसे नहीं हो जैसा मैंने सोचा था।"
समर मुस्कुराया।
"अच्छा या बुरा?"
अन्विता ने कुछ क्षण सोचा।फिर बोली..."अधिक वास्तविक।"
और समर को लगा...
शायद यह उसके लिए अब तक की सबसे सुंदर प्रशंसा थी।
बातें शुरू हुईं।
धीरे-धीरे....बचपन.....किताबें.....शहर....बारिश.....माँ.....पिता.....डर.....स्मृतियाँ......
लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि वे कोई नई बात नहीं कर रहे थे।
वे केवल उन बातों को आवाज़ दे रहे थे...जो पहले से एक-दूसरे के भीतर मौजूद थीं।
सूरज धीरे-धीरे डूबने लगा।दुकान में अँधेरा उतरने लगा।
और तभी...
एक लंबी चुप्पी आई।अन्विता खिड़की के बाहर देखने लगी।
फिर बहुत धीरे से बोली,
"समर...
मुझे लगता है हमें नहीं मिलना चाहिए था।"
समर का दिल बैठ गया।लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
अन्विता की आँखें अब भी बाहर थीं।
"क्योंकि अब मुझे पता है कि तुम सचमुच हो।
और अब तुम्हें खोना पहले से कहीं अधिक कठिन होगा।"
कमरे में मौन भर गया।
समर ने पहली बार उसकी आँखों में नमी देखी।
वह रो नहीं रही थी।
लेकिन आँसू और रोना हमेशा एक ही बात नहीं होते।
और उसी क्षण...
समर ने समझ लिया कि उनकी कहानी की सबसे बड़ी त्रासदी शुरू हो चुकी है।
पहले वे एक-दूसरे को खो सकते थे।
क्योंकि वे एक-दूसरे के पास नहीं थे।
अब वे एक-दूसरे को खोएँगे...
क्योंकि वे एक-दूसरे के बहुत पास आ चुके थे।
खिड़की के बाहर शाम उतर रही थी।
और भीतर...
दो लोग पहली बार एक-दूसरे के सामने बैठे थे।
फिर भी दोनों के मन में एक ही प्रश्न था—
"क्या प्रेम हमेशा इतनी देर से आता है?"