तुम और मैं

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हर किसी की जिंदगी में एक ऐसा इंसान होता है, जो सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक एहसास होता है। एक ऐसी रूह, जो आपकी धड़कनों में बसती है, आपकी मुस्कुराहट की वजह बनती है और आपके वजूद का अभिन्न हिस्सा बन जाती है। वो इंसान जिसे देखते ही तमाम उलझनें थम सी जाती हैं और जिंदगी एक सुकून भरी कविता जैसी लगने लगती है। मेरे लिए, वो रूह, वो नाम और वो सुकून—कान्हा पचौरी है।​जब मैं 'कान्हा' शब्द कहती हूँ, तो मेरे ज़ेहन में दुनिया की दिखाई गई वो बाहरी तस्वीरें नहीं आतीं,

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तुम और मैं - 1

हर किसी की जिंदगी में एक ऐसा इंसान होता है, जो सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक एहसास होता एक ऐसी रूह, जो आपकी धड़कनों में बसती है, आपकी मुस्कुराहट की वजह बनती है और आपके वजूद का अभिन्न हिस्सा बन जाती है। वो इंसान जिसे देखते ही तमाम उलझनें थम सी जाती हैं और जिंदगी एक सुकून भरी कविता जैसी लगने लगती है। मेरे लिए, वो रूह, वो नाम और वो सुकून—कान्हा पचौरी है।​जब मैं 'कान्हा' शब्द कहती हूँ, तो मेरे ज़ेहन में दुनिया की दिखाई गई वो बाहरी तस्वीरें नहीं आतीं, बल्कि उन गलियों की यादें आती ...Read More

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तुम और मैं - 2

हर बड़ा इंसान, अपने अंदर एक छोटा बच्चा हमेशा संभाल कर रखता है। कान्हा की शख्सियत की गहराई को के लिए, मुझे उनके बचपन के उन पन्नों को पलटना ज़रूरी लगता है, जहाँ से इस सादगी और ज़िद का जन्म हुआ।कान्हा का बचपन बहुत ही अलग और अपनी ही धुन में रहने वाला रहा है। जहाँ दूसरे बच्चे खिलौनों के पीछे भागते थे, कान्हा में बचपन से ही एक ऐसी समझ थी जो उनकी उम्र से कहीं बड़ी लगती थी। सुनने में आता है कि वो बचपन में बहुत ही भोले और मासूम थे ,याद आता है वह दिन, ...Read More

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तुम और मैं - 3

बचपन की वो मासूम यादें आज भी मेरे पास सुरक्षित हैं, लेकिन कहानी का असली मोड़ तो तब आया हम बड़े हुए। उन दिनों, फेसबुक पर हुई वो पहली मुलाकात के बाद, मैं और कान्हा दो अलग ध्रुवों (poles) की तरह थे।मैं अक्सर कान्हा से बात करने में बहुत कंजूसी करती थी। मेरे जवाब छोटे, रूखे और कभी-कभी तो बस एक शब्द के होते थे— 'हूँ', 'हाँ', या 'ठीक है'। मुझे नहीं पता था कि मैं ऐसा क्यों कर रही थी—शायद एक दीवार खड़ी कर रही थी या शायद मुझे उस वक्त इस रिश्ते की गहराई का अंदाजा नहीं ...Read More

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तुम और मैं - 4

2020 से 2022 तक के उन दो सालों के इंतज़ार की घड़ियाँ, जब अंततः 2022 में उस 'हाँ' में तो लगा जैसे कोई बहुत बड़ा बोझ उतर गया हो। कान्हा के लिए वह सिर्फ एक शब्द नहीं था, बल्कि उन दो सालों की मेहनत और धैर्य की सबसे बड़ी जीत थी। मैं आज भी उस पल को याद करती हूँ तो महसूस होता है कि कान्हा की खुशी कितनी मासूम और सच्ची थी। वह खुशी किसी बड़े इनाम जैसी नहीं, बल्कि एक बहुत ही सुकून भरी मुस्कान जैसी थी—जैसे एक लंबे सफर के बाद उन्हें अपना घर मिल गया ...Read More

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तुम और मैं - 5

​3 दिसंबर 2022 की उस मुलाकात के बाद, अब हमारे बीच कोई पर्दा नहीं था। सच की उस गहराई हमें एक-दूसरे के और करीब ला दिया था। लेकिन अब समस्या दूरी की नहीं, बल्कि 'साधन' की थी। मेरे पास अपना कोई फोन नहीं था, और कान्हा से बात करना मेरी दिनचर्या का सबसे अहम हिस्सा बन चुका था।​मेरी जिंदगी का वह दौर कॉलेज की उन जगहों में सिमटा हुआ था। मैं अपने कॉलेज के फ्री टाइम का बेसब्री से इंतज़ार करती—न तो कैंटीन की मस्ती के लिए, न ही दोस्तों के साथ गप्पें मारने के लिए, बल्कि इसलिए कि ...Read More

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तुम और मैं - 6

दिसंबर की सर्दियाँ अपनी पूरी रफ़्तार पर थीं। कॉलेज के कमरो में ठंडी हवाओं का डेरा था और हम क्लास की बिल्डिंग की ऊपरी मंजिल पर बैठे थे। वह दिन किसी और दिन जैसा ही लग रहा था, लेकिन मेरी सहेली के एक वाक्य ने सब कुछ बदल दिया। उसने फुसफुसाते हुए कहा, "प्रिया, कान्हा बाहर आए हैं, वो कॉलेज के गेट के बाहर खड़े हैं। उन्होंने लाल रंग की टी-शर्ट पहनी है।"​जैसे ही यह खबर मिली, मेरे दिल की धड़कनें एक अलग लय में बजने लगीं। कॉलेज की उस बिल्डिंग की ऊंचाई से नीचे सड़क को देखना एक ...Read More

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तुम और मैं - 7

21 जनवरी की वो सुबह कुछ अलग थी। कान्हा बाइक लेकर आए थे और उन्होंने मुझे पीछे बिठाया। हम के शोर से दूर, उस पहाड़ी मंदिर की ओर निकल पड़े। रास्ते भर ठंडी हवाएँ चेहरे को छू रही थीं, लेकिन कान्हा के पीछे बैठना और उनके जैकेट की गर्माहट महसूस करना, उस सर्दी को भी प्यार में बदल रहा था।​जब हम मंदिर पहुँचे, तो सामने खड़ी थीं—108 सीढ़ियाँ। उन्हें देखकर ही एक बार तो लगा कि क्या हम चढ़ पाएंगे? पर कान्हा ने मेरा हाथ थामा और बोले, "साथ चलेंगे, थकोगी नहीं।"​उन 108 सीढ़ियों को चढ़ना किसी परीक्षा से ...Read More