वह मिलने का फैसला हमारे रिश्ते की परिपक्वता (maturity) को दर्शाता था। हमने महसूस किया कि फोन और मैसेज तो बस जरिया हैं, असली सुकून तो एक-दूसरे के साथ होने में है। उस मुलाकात की तैयारी में, उन दिनों के इंतज़ार में, हमने न जाने कितने सपने बुने। ऐसा लगता था जैसे हम एक-दूसरे के और करीब आने की सीढ़ी चढ़ रहे हों। कान्हा का वही पुराना उत्साह और मेरा वही नयापन—सब कुछ मिलकर एक नई कहानी लिख रहा था।हमारे बीच जो था, वह किसी भी सांसारिक दिखावे से परे था। हमारे रिश्ते में कोई गलत इरादा या कोई ऐसी भावना नहीं थी जो हमारे प्यार की पवित्रता को कम करे। हम बस एक-दूसरे की मौजूदगी को पूरी तरह महसूस करना चाहते थे। जब हम एक-दूसरे के करीब जाना चाहते थे, तो वह महज एक शारीरिक चाहत नहीं थी, बल्कि यह उस प्यार का एक स्वाभाविक विस्तार था जो हम दोनों के अंदर पनप रहा था।हम दोनों जानते थे कि हम एक-दूसरे के लिए कितने अहम हैं। जब हम मिलते थे, तो उन मुलाकातों में कोई जल्दबाजी नहीं होती थी। कान्हा का हाथ थामना, उनके पास बैठकर सुकून महसूस करना, या बस एक-दूसरे को देखते रहना—ये छोटे-छोटे पल हमारे लिए किसी जन्नत से कम नहीं थे। हम एक-दूसरे की बाहों में वो सुरक्षा ढूंढना चाहते थे जो हमें दुनिया में कहीं नहीं मिली।
उस दौर में, जब मैं कान्हा के करीब होती थी, तो मुझे ऐसा लगता था जैसे मैं पूरी दुनिया के शोर से दूर, अपने सबसे सुरक्षित आशियाने में आ गई हूँ। वह नज़दीकी हमारे बीच के उस भरोसे को और गहरा कर देती थी जिसे हमने बहुत मुश्किल से बनाया था। हम सिर्फ एक-दूसरे को छूना नहीं चाहते थे, हम एक-दूसरे की रूह को महसूस करना चाहते थे।
कान्हा का वो स्पर्श, उनकी वो फिक्र, और मेरी वो बेचैनी जो उनके करीब आते ही शांत हो जाती थी—यह सब हमारे प्यार की भाषा थी। वह अहसास बहुत ही निर्मल और निश्छल था। हमें पता था कि हम गलत नहीं हैं, हम बस अपने प्यार को मुकम्मल करना चाहते थे। हम उस दूरी को मिटाना चाहते थे जो हमें दो अलग-अलग इंसान के तौर पर देखती थी।
वह जो करीब आने की चाहत थी, उसने मुझे सिखाया कि प्यार सिर्फ बातों में नहीं, बल्कि साथ बैठकर उस खामोशी को बांटने में भी होता है। उन मुलाकातों में कोई 'दायरा' खींचने की ज़रूरत नहीं थी, क्योंकि हम दोनों ही किसी भी तरह की गलत सोच या इरादों से कोसों दूर थे। मुझे तो उस वक्त यह भी नहीं पता था कि मिलने पर आखिर 'करना' क्या होता है। मैं तो बस कान्हा की मौजूदगी से ही इतनी अभिभूत थी कि मेरा दिल ज़ोरों से धड़कने लगता था।
कान्हा के सामने आते ही मेरी हिम्मत जवाब दे जाती थी। मैं उनसे नज़रें तक नहीं मिला पाती थी। जैसे ही उनकी नज़रें मेरी तरफ होतीं, मेरी नज़रें खुद-ब-खुद नीचे झुक जाती थीं। मुझे खुद नहीं पता था कि मैं क्यों इतनी शर्माती थी, क्यों मेरा चेहरा लाल हो जाता था, और क्यों मैं उनसे नजरें चुराने लगती थी। वो एक ऐसी झिझक थी जो मेरे पूरे वजूद पर हावी हो जाती थी।
कान्हा को देखते ही मेरे अंदर एक अजीब सी हलचल मच जाती। वो मुझे देखते, और मैं अपनी नज़रों को अपने दुपट्टे के कोनों या अपने जूतों में ढूंढने लगती। न तो मेरे मन में कोई 'physical' होने की चाहत थी, और न ही कान्हा की तरफ से ऐसी कोई जल्दबाजी। हम बस साथ थे, और वही हमारे लिए बहुत था।
वो शर्म, वो नज़रों का झुकना, वो कान्हा की खामोश मुस्कुराहट और मेरी वो घबराहट—यह सब किसी अनकही कविता जैसा था। शायद इसीलिए वो मुलाकातें आज भी मुझे इतनी पवित्र लगती हैं। मैं कान्हा से बहुत शर्माती थी, और वो मुझे उसी रूप में पसंद करते थे। शायद उन्हें भी मेरी वो झुकी हुई नज़रें अच्छी लगती थीं, क्योंकि उनमें वो मासूमियत थी जो बनावटी दुनिया में कहीं खो गई है।
मेरे लिए कान्हा एक ऐसा व्यक्तित्व थे जिसे मैं बस देखना चाहती थी, पर सामने आते ही मेरा साहस डगमगा जाता था। हम दोनों ही इस रिश्ते की नजाकत को बिना कहे समझ रहे थे। वो कोई 'प्लान' नहीं था, बस एक-दूसरे के पास होने का सुकून था। उस वक्त की वो मासूमियत ही हमारे इस रिश्ते की सबसे बड़ी ताकत रही।3 दिसंबर की वो मुलाकात अभी मेरी यादों में ताज़ा ही थी कि 9 दिसंबर 2022 को हम फिर से मिले। सिर्फ 6 दिनों का फासला! जैसे दिल को चैन ही नहीं था। पहली मुलाकात में जो 'अजनबीपन' था, वो अब धीरे-धीरे 'अपनापन' में बदल रहा था।
इस बार भी मेरी सहेली साथ थी, लेकिन कान्हा के सामने आते ही मेरी वही पुरानी 'शर्म' फिर जाग गई। मेरी नज़रें फिर से नीचे झुक गईं और दिल की धड़कनें फिर उसी रफ़्तार से बढ़ने लगीं। कान्हा मुझे देख रहे थे, और मैं बस अपनी उंगलियों को मरोड़ रही थी। मुझे अजीब सा महसूस होता था कि मैं उनके सामने क्यों नहीं देख पा रही, जबकि फोन पर तो मैं उनसे घंटों बातें करती थी। पर सामने होना और बात करना—इन दोनों में कितना बड़ा फर्क था!
उस मुलाकात में कान्हा ने कुछ नहीं कहा। वे जानते थे कि मैं शर्माती हूँ, वे जानते थे कि मुझे सहज होने में वक्त लगेगा। उन्होंने कोई जल्दबाजी नहीं की। हम बस पास बैठे थे। वो खामोशी अब बोझ नहीं लग रही थी, बल्कि उस खामोशी में एक अजीब सा सुकून था। 9 दिसंबर की उस ठंडी हवाओं में, बस कान्हा का साथ होना ही मेरे लिए सब कुछ था।
मुझे याद है, उस दिन भी मेरे मन में कोई 'physical' इच्छा नहीं थी। मैं बस चाहती थी कि वक्त वहीं ठहर जाए। कान्हा के करीब होने का एहसास—बिना कुछ कहे, बिना नज़रों को मिलाए—मेरे लिए किसी बड़े वादे से कम नहीं था। उस दिन मुझे एहसास हुआ कि प्यार करना मतलब सिर्फ एक-दूसरे का नाम लेना नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पास बैठकर उस सादगी को महसूस करना है जो दुनिया की भीड़ में कहीं खो गई है।
मेरी नज़रें झुकी हुई थीं, लेकिन मेरे दिल में कान्हा के लिए इज़्ज़त और गहराती जा रही थी। वे मेरी उस शर्म को प्यार से समझ रहे थे। उस दिन के बाद से, मुझे लगा कि अब मैं कान्हा के बिना अपने दिन की कल्पना भी नहीं कर सकती। 9 दिसंबर की वो मुलाकात हमारे रिश्ते की दूसरी ईंट थी, जिसने इस प्यार की दीवार को और मजबूत कर दिया था।हमारी उन मुलाकातों में, कान्हा कभी भी किसी शारीरिक नज़दीकी की जल्दबाजी में नहीं थे। उनके लिए मेरा साथ होना ही सबसे बड़ा इनाम था। जब भी हम मिलते, कान्हा बस मेरा हाथ थाम लेते थे। बस, इतना ही! और सच मानूँ तो, उस एक स्पर्श में जो सुकून और जो सुरक्षा थी, वो दुनिया के किसी भी बड़े शब्द से ज्यादा कह जाती थी।
मैं उस वक्त फिजिकल फीलिंग्स से पूरी तरह अंजान थी। मुझे पता भी नहीं था कि प्यार में और क्या-क्या हो सकता है या क्या होना चाहिए। मेरे लिए तो कान्हा का वो हाथ थामना ही 'सब कुछ' था। और कान्हा? उनके मन में भी ऐसी कोई गलत सोच या शारीरिक इच्छा का कोई विचार तक नहीं था। वे मेरी मासूमियत को, मेरी उस झिझक को और मेरी नज़रों को जो बार-बार झुक जाती थीं, बहुत गहराई से समझते थे।
उस स्पर्श में एक 'जुड़ाव' था—जैसे कान्हा मुझे कह रहे हों, "डरो मत, मैं हूँ ना।" और मेरी तरफ से, उस हाथ को थामे रखना, मेरी रजामंदी और मेरे भरोसे की निशानी थी। हमें एक-दूसरे को छूने की, या और करीब जाने की कोई तलब नहीं थी। बस वो हाथ का साथ, वो खामोशी, और वो एक-दूसरे के होने का अहसास—उसी में हमें पूरी दुनिया मिल जाती थी।
कभी-कभी लगता है कि आज के दौर में, जहाँ लोग 'प्यार' को एक अलग ही नज़िए से देखते हैं, हमारा वो 'हाथ थामना' कितना अनमोल था। वो एक ऐसा संवाद था जिसमें भाषा की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। कान्हा के उस स्पर्श में एक अदृश्य शक्ति थी जो मेरे सारे डर को, मेरी सारी घबराहट को एक पल में सोख लेती थी। वो मुझे बस थामे रखते, और मैं उस सुरक्षा के अहसास में अपनी सारी शर्म भूलकर बस वहीं ठहर जाना चाहती थी।
हमें किसी ने नहीं सिखाया था कि ये रिश्ता क्या है, लेकिन हम जानते थे कि हम एक-दूसरे के लिए बने हैं। उस वक्त की वो मासूमियत, वो बिना किसी स्वार्थ का हाथ थामना—आज भी जब मैं याद करती हूँ, तो मेरा दिल भर आता है। वो पल ही थे जिन्होंने हमारे रिश्ते को वो गहराई दी, जो आज भी कायम है।
— प्रिया चौधरी (बेटू)