बचपन की वो मासूम यादें आज भी मेरे पास सुरक्षित हैं, लेकिन कहानी का असली मोड़ तो तब आया जब हम बड़े हुए। उन दिनों, फेसबुक पर हुई वो पहली मुलाकात के बाद, मैं और कान्हा दो अलग ध्रुवों (poles) की तरह थे।मैं अक्सर कान्हा से बात करने में बहुत कंजूसी करती थी। मेरे जवाब छोटे, रूखे और कभी-कभी तो बस एक शब्द के होते थे— 'हूँ', 'हाँ', या 'ठीक है'। मुझे नहीं पता था कि मैं ऐसा क्यों कर रही थी—शायद एक दीवार खड़ी कर रही थी या शायद मुझे उस वक्त इस रिश्ते की गहराई का अंदाजा नहीं था। कान्हा का धैर्य उस वक्त मेरे लिए एक पहेली था। मैं जितना दूर भागती, जितना नजरअंदाज करती, वह उतना ही स्थिर और शांत बना रहता।कान्हा के बचपन के वो पन्ने पलटने के बाद, जब मैं आज के समय में वापस आती हूँ, तो मुझे अपनी उस पुरानी 'मैं' पर बहुत अजीब लगता है। फेसबुक की उन पहली कुछ मुलाकातों में, मैं और कान्हा बिल्कुल दो अलग किनारों की तरह थे। मैं वो, जो कान्हा की मौजूदगी को भी बर्दाश्त नहीं करना चाहती थी और वो, जो खामोशी से इंतज़ार करना जानता था।सच कहूँ तो, शुरुआत में मैं कान्हा से कभी ठीक से बात नहीं करती थी। मैं बहुत रूखी थी, बहुत पत्थरदिल। वो अगर प्यार से 'हेलो' भी कहते, तो मेरा जवाब अक्सर गुस्से और चिड़चिड़ेपन से भरा होता था। मैं जानबूझकर उन्हें इग्नोर करती, उनकी बातों को अनसुना कर देती, या फिर बहुत ही संक्षिप्त और कटु जवाब देती। मुझे लगता था कि मैं बहुत स्मार्ट हूँ, मैं किसी को अपने करीब नहीं आने दूंगी। मैं अक्सर उन्हें गुस्से में जवाब देती थी, जैसे कि मैं उनसे नफरत करती हूँ। मेरी हर बात में एक कड़वाहट थी, एक दीवार थी जिसे मैं बहुत सावधानी से खड़ा कर रही थी।
लेकिन कान्हा? कान्हा का धैर्य उस वक्त मेरे लिए एक बहुत बड़ी पहेली था। मैं जितना ज्यादा गुस्से में जवाब देती, वो उतने ही शांत होकर उसे स्वीकार कर लेते। मैं जितना बुरा बर्ताव करती, वो उतना ही ज़्यादा अपनापन दिखाते। कभी-कभी मुझे हैरानी होती थी—क्या उन्हें मेरी बेरुखी दिखाई नहीं देती थी? क्या उन्हें अपना स्वाभिमान नहीं दिखता था? मैं उन्हें हर्ट करने की कोशिश करती, लेकिन वो हर्ट होने के बजाय मुस्कुरा देते या फिर बस एक शांत संदेश भेज देते कि "कोई बात नहीं, मैं इंतज़ार करूँगा।"
वो जो घंटों का सन्नाटा होता था, और मेरा वो गुस्से भरा 'जी' या 'हाँ' कहकर बात खत्म कर देना—कान्हा ने उस सन्नाटे को अपनी सहनशीलता से भर दिया था। वो मुझे कभी गुस्सा नहीं दिलाते थे। अगर मैं आग होती, तो वो पानी बन जाते। उनकी ये खूबी—कि उन्होंने कभी अपनी मर्यादा नहीं छोड़ी—यही वो चीज़ थी जिसने धीरे-धीरे मेरी 'अहंकार' की उस दीवार को गिराना शुरू कर दिया।
मैं अक्सर खुद से पूछती थी कि आखिर वो ऐसा क्यों कर रहे हैं? क्यों कोई इंसान एक ऐसी लड़की के पीछे अपना वक्त बर्बाद करेगा जो उसे हर बार जलील कर रही है? लेकिन फिर समझ आता था कि ये कान्हा की 'जिद' नहीं, ये उनका 'संस्कार' है। वो लड़का था ही ऐसा, जो जो एक बार ठान ले, उसे पूरा करता है। उन्होंने ठान लिया था कि वे मेरा दिल जीतेंगे, और उन्होंने मेरी बेरुखी को भी अपने प्यार के धैर्य से जीत लिया।
मेरा गुस्सा, मेरी चीड़, मेरी कड़वाहट—सब कुछ उनके उस शांत सागर जैसे धैर्य के आगे हारने लगा था। धीरे-धीरे, मेरे उन छोटे और गुस्से भरे जवाबों की जगह बड़े और प्यार भरे वाक्यों ने ले ली। मुझे नहीं पता था कि मैं कब उस 'गुस्से' की लपेट से बाहर आकर, उनके 'प्यार' की छाया में आ गई। मेरा वो बचपन का पत्थर दिल, उनके इस धैर्य की गर्मी से पिघलकर मोम सा हो गया था।
आज जब मैं सोचती हूँ, तो लगता है कि अगर कान्हा ने भी मेरी तरह गुस्सा किया होता, तो शायद आज हम यहाँ न होते। उन्होंने मुझे नहीं बदला, उन्होंने अपने उस धैर्य से मुझे मेरी गलतियों का एहसास कराया। मैं आज भी शुक्रगुज़ार हूँ उस कान्हा की, जिसने मेरी नफरत और गुस्से को भी अपने प्यार से ही सींचा...😊
कहते हैं कि सच्चा प्यार वो नहीं जो एक ही पल में मिल जाए, बल्कि वो है जो इंतज़ार की हर अग्निपरीक्षा से गुजरकर और भी खरा हो जाए। हमारी कहानी की शुरुआत 2020 में फेसबुक के उस डिजिटल पन्नों से हुई थी। लेकिन सच तो ये है कि 2020 से 2022 तक का वो समय, कान्हा के धैर्य और मेरे 'अहंकार' के बीच की एक बहुत बड़ी जंग थी।
पूरे दो साल! यह समय सुनने में छोटा लगता है, लेकिन किसी ऐसे इंसान के लिए जो रोज आपको एक उम्मीद के साथ मैसेज करता हो, ये दो साल किसी तपस्या से कम नहीं थे। 2020 से 2022 तक, मैंने उन्हें न जाने कितनी बार इग्नोर किया होगा। मेरे मैसेज में वही रूखापन, वही गुस्से से भरे जवाब और वही बेरुखी थी। मैं अक्सर जानबूझकर उन्हें अनदेखा कर देती थी। क्या उन्हें बुरा नहीं लगता था? क्या उनका स्वाभिमान उन्हें यह नहीं कहता था कि "बस बहुत हुआ"? लेकिन कान्हा शायद मिट्टी के किसी अलग ही साँचे से बने थे।
वो दो साल मेरे लिए एक पत्थर की तरह थे, और कान्हा के लिए एक अनवरत प्रार्थना की तरह। हर दिन, हर मैसेज, हर उस 'हेलो' में वही एक उम्मीद छिपी होती थी कि शायद आज का दिन अलग होगा। मैं उन्हें गुस्से में जवाब देती, कभी उनसे बात करने से मना कर देती, लेकिन कान्हा की प्रतिक्रिया में कभी कोई कड़वाहट नहीं आई। वे हमेशा शांत रहे, हमेशा स्थिर। जैसे वे जानते हों कि मैं सिर्फ ऊपर से कठोर हूँ और अंदर कहीं न कहीं, मेरी एक अलग दुनिया है।
उन दो सालों में उन्होंने मुझे कभी मजबूर नहीं किया। उन्होंने कभी मुझसे शिकवा नहीं किया कि मैं उनसे इतनी बदतमीजी से क्यों पेश आती हूँ। बस एक खामोश इंतज़ार था—वो इंतज़ार जो सिर्फ वही कर सकते थे, जिनकी नीयत में कोई छल न हो। उनके उन संदेशों में कोई दिखावा नहीं था, बस एक सादगी भरी कोशिश थी कि मैं उन्हें जान सकूँ।
और फिर आया वो पल, वो 2022 का साल, जब मेरी वो पत्थर सी दीवार अंततः ढह गई। मैंने उन्हें 'हाँ' कहा। उस 'हाँ' में सिर्फ एक शब्द नहीं था, बल्कि उन दो सालों के दौरान उनके द्वारा दिखाए गए उस असीमित धैर्य की जीत थी। जिस दिन मैंने उन्हें स्वीकार किया, मुझे लगा जैसे दो साल से चली आ रही एक ठंडी रात अचानक किसी मीठी सुबह में बदल गई हो।
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो मुझे खुद पर गुस्सा भी आता है और कान्हा पर गर्व भी। उस दो साल के सफर ने कान्हा को मेरे लिए सिर्फ एक 'दोस्त' या 'जानने वाला' नहीं, बल्कि 'जीवन का साथी' बना दिया। कान्हा ने मुझे यह सिखाया कि प्यार का मतलब सिर्फ हासिल करना नहीं, बल्कि इंतज़ार करना भी होता है। उन्होंने मुझे बिना जीते ही जीत लिया था। वो 2022 का साल मेरे जीवन का सबसे सुनहरा मोड़ था, क्योंकि उसी पल से मेरी जिंदगी में कान्हा के होने का सही मतलब समझ आया।
❤️❤️