प्रतीकोपासना स्वप्रतीक से आत्मज्योति की ओर भाग १ : प्रतीक का दर्शन और साधना का प्रारंभ शिवसंहिता के इस प्रसंग में योग की एक विशिष्ट साधना का वर्णन मिलता है, जिसे प्रतीकोपासना कहा गया है। यहाँ साधना का आधार साधक का अपना ही प्रतिबिंब है। अर्थात् साधक अपने बाहरी रूप को ही एक प्रतीक बनाकर उसके माध्यम से ध्यान को क्रमशः सूक्ष्म और अंतर्मुख करने का अभ्यास करता है। इस साधना का उद्देश्य केवल अपने प्रतिबिंब को देखना नहीं है। youtube:- अखिल गीता
Full Novel
प्रतीकोपासना - भाग 1
प्रतीकोपासना स्वप्रतीक से आत्मज्योति की ओरभाग १ : प्रतीक का दर्शन और साधना का प्रारंभशिवसंहिता के इस प्रसंग में की एक विशिष्ट साधना का वर्णन मिलता है, जिसे प्रतीकोपासना कहा गया है। यहाँ साधना का आधार साधक का अपना ही प्रतिबिंब है। अर्थात् साधक अपने बाहरी रूप को ही एक प्रतीक बनाकर उसके माध्यम से ध्यान को क्रमशः सूक्ष्म और अंतर्मुख करने का अभ्यास करता है।इस साधना का उद्देश्य केवल अपने प्रतिबिंब को देखना नहीं है। ग्रंथ में इसका एक क्रम दिया गया है प्रतीक का दर्शन, उसका आकाश में अनुभव, निरंतर अभ्यास, हृदयाकाश में उसके भान की अवस्था ...Read More
प्रतीकोपासना - भाग 2
प्रतीकोपासना :- इंद्रिय-निरोध से आत्मज्योति तकभाग २ : भीतर की ओर मुड़ती साधनाप्रतीकोपासना के पहले चरण में साधक अपने प्रतिबिंब को स्वप्रतीक बनाकर उसका अभ्यास करता है। पहले अपने प्रतिबिंब का दर्शन, फिर आकाश में उसी प्रतीक को देखने का अभ्यास और निरंतर साधना के द्वारा हृदयाकाश में स्वप्रतीक के भान की बात कही गई है। इस प्रकार साधना धीरे-धीरे बाहरी दृश्य से भीतर के अनुभव की ओर बढ़ती है।अब शिवसंहिता इसी साधना को एक और गहरे स्तर पर ले जाती है। यहाँ साधक को अपनी इंद्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर भीतर की ओर स्थिर करने की एक ...Read More
प्रतीकोपासना - भाग 3
प्रतीकोपासना :-आत्मज्योति से नाद और लय तकभाग ३ : नाद का अनुभव और चित्त का विलयप्रतीकोपासना की साधना अब बिंदु पर पहुँच चुकी है जहाँ साधक का ध्यान बाहरी प्रतीक से आगे बढ़कर भीतर की ओर स्थिर हो चुका है। पहले अपने प्रतिबिंब को स्वप्रतीक बनाकर उसका अभ्यास किया गया, फिर उसी प्रतीक का आकाश में दर्शन, हृदयाकाश में उसके भान की अवस्था, इंद्रिय-निरोध और वायु-निरोध के द्वारा चित्त को अंतर्मुख करने की प्रक्रिया आई। इसके बाद आत्मा को ज्योतिरूप में देखने और निरंतर अभ्यास के द्वारा आत्मस्वरूप में अभिन्न होने की बात कही गई।अब शिवसंहिता साधना के एक ...Read More
प्रतीकोपासना - भाग 4
प्रतीकोपासना :- संपूर्ण साधना का क्रमभाग ४ : स्वप्रतीक से चिदाकाश तकअब तक हमने प्रतीकोपासना के तीन प्रमुख चरणों समझा है। पहले चरण में साधक अपने ही प्रतिबिंब को स्वप्रतीक बनाकर उसका अभ्यास करता है। दूसरे चरण में यही साधना इंद्रिय-निरोध, वायु-निरोध और आत्मज्योति के दर्शन तक पहुँचती है। तीसरे चरण में साधक को नाद का अनुभव होता है, वह अपने चित्त को नाद में स्थिर करता है और वहाँ से लय तथा चिदाकाश की दिशा में आगे बढ़ता है।अब इन सभी चरणों को अलग-अलग देखने के बजाय एक संपूर्ण साधना-क्रम के रूप में समझते हैं। इससे स्पष्ट होगा ...Read More