प्रतीकोपासना :- संपूर्ण साधना का क्रम
भाग ४ : स्वप्रतीक से चिदाकाश तक
अब तक हमने प्रतीकोपासना के तीन प्रमुख चरणों को समझा है। पहले चरण में साधक अपने ही प्रतिबिंब को स्वप्रतीक बनाकर उसका अभ्यास करता है। दूसरे चरण में यही साधना इंद्रिय-निरोध, वायु-निरोध और आत्मज्योति के दर्शन तक पहुँचती है। तीसरे चरण में साधक को नाद का अनुभव होता है, वह अपने चित्त को नाद में स्थिर करता है और वहाँ से लय तथा चिदाकाश की दिशा में आगे बढ़ता है।
अब इन सभी चरणों को अलग-अलग देखने के बजाय एक संपूर्ण साधना-क्रम के रूप में समझते हैं। इससे स्पष्ट होगा कि शिवसंहिता में प्रतीकोपासना केवल प्रतिबिंब देखने की कोई एक विधि नहीं है, बल्कि एक ऐसी क्रमिक साधना है जिसमें साधक का ध्यान धीरे-धीरे बाहरी प्रतीक से भीतर के सूक्ष्म अनुभव की ओर जाता है।
१. साधना की शुरुआत स्वप्रतीक
प्रतीकोपासना की शुरुआत अपने ही प्रतिबिंब से होती है।
साधक अपने प्रतिबिंब को देखता है और उसे साधना का आधार बनाता है। गहरी धूप में अपने प्रतिबिंब को स्थिर दृष्टि से देखने और फिर आकाश की ओर देखने की विधि बताई गई है। इस अभ्यास के द्वारा आकाश में अपने स्वप्रतीक का दर्शन होने की बात कही गई है।
यहाँ से साधना का पहला परिवर्तन शुरू होता है।
साधक जिस प्रतिबिंब को पहले अपने सामने देख रहा था, उसी प्रतीक को अब आकाश में देखने का अभ्यास करता है। अर्थात् उसका ध्यान एक निश्चित प्रतीक पर स्थिर किया जा रहा है।
इसके बाद प्रतिदिन इस अभ्यास को करने की बात कही गई है। नियमित अभ्यास से स्वप्रतीक का दर्शन अधिक पूर्ण होने की अवस्था का वर्णन मिलता है।
इस प्रकार प्रारंभिक साधना का क्रम है
अपने प्रतिबिंब का दर्शन → आकाश में स्वप्रतीक का दर्शन → निरंतर अभ्यास।
२. प्रतीक से हृदयाकाश तक
जब साधक इस अभ्यास में निरंतर लगा रहता है, तब प्रतीकोपासना का केंद्र धीरे-धीरे बाहरी दृश्य से भीतर की ओर जाता है।
शिवसंहिता में कहा गया है कि निरंतर अभ्यास के द्वारा साधक अपने स्वप्रतीक का अनुभव भीतर करता है। टीका इस अनुभव को हृदयाकाश में अपने स्वरूप के भान से जोड़ती है।
यहाँ प्रतीक का महत्व और गहरा हो जाता है।
प्रारंभ में प्रतीक आँखों के सामने था।
फिर वही प्रतीक आकाश में दिखाई देने लगा।
अब उसका भान हृदयाकाश में होने लगता है।
इस प्रकार साधना की दिशा बाहर से भीतर की ओर हो जाती है।
यहीं से प्रतीकोपासना केवल किसी दृश्य के दर्शन की साधना नहीं रह जाती। यह साधक के अपने स्वरूप के अनुभव की दिशा में आगे बढ़ती है।
३. आत्मज्योति की ओर
इसके बाद शिवसंहिता साधक को इंद्रियों के निरोध और वायु के नियंत्रण की विधि बताती है।
दोनों कानों को अंगूठों से, आँखों को तर्जनी से, नासारंध्रों को मध्यमा से और मुख को अनामिका तथा कनिष्ठिका से बंद करने का वर्णन मिलता है।
इस प्रकार साधक बाहरी इंद्रिय-द्वारों को रोकता है।
इसके साथ वायु के निरोध का अभ्यास किया जाता है।
इस पूरी प्रक्रिया का परिणाम आत्मा को ज्योतिरूप में देखने के रूप में बताया गया है।
यहाँ साधना का आधार और सूक्ष्म हो जाता है।
पहले साधक बाहरी प्रतिबिंब देख रहा था।
अब वह आत्मा की ज्योति के दर्शन की ओर बढ़ रहा है।
इसलिए प्रतीकोपासना का क्रम केवल प्रतीक के दर्शन पर समाप्त नहीं होता। प्रतीक साधक को अंतर्मुख करने का माध्यम बनता है और साधना आगे आत्मज्योति के अनुभव तक जाती है।
४. आत्मतेज का दर्शन
शिवसंहिता आत्मा के इस तेज को अत्यंत महत्वपूर्ण बताती है।
जो साधक स्थिर और निराकुल चित्त से उस तेज को क्षणमात्र भी देखता है, उसके लिए परम गति की प्राप्ति और पापों से मुक्ति का फल बताया गया है।
यहाँ साधक के चित्त की स्थिति पर विशेष ध्यान दिया गया है।
चित्त निराकुल होना चाहिए।
अर्थात् साधक का मन बाहरी चंचलता और विक्षेप से मुक्त होकर स्थिर हो।
इसीलिए इंद्रिय-निरोध और वायु-निरोध के बाद आत्मज्योति का दर्शन बताया गया है। साधना का प्रत्येक चरण अगले चरण के लिए चित्त को तैयार करता हुआ दिखाई देता है।
५. दर्शन से अभिन्नता तक
आत्मज्योति का दर्शन होने के बाद भी साधना समाप्त नहीं होती।
शिवसंहिता फिर निरंतर अभ्यास की बात करती है। जो योगी इस अभ्यास को लगातार करता है और जिसका चित्त शुद्ध होता जाता है, वह देहादि के भाव को भूलकर आत्मा से अभिन्न होने की अवस्था को प्राप्त करता है।
यहाँ साधना में एक महत्वपूर्ण अंतर आता है।
पहले साधक आत्मज्योति का दर्शन करता था।
अब वह केवल उस ज्योति को देखने वाला नहीं रहता, बल्कि आत्मा से अभिन्न होने की अवस्था की ओर बढ़ता है।
अर्थात् साधना में देखने वाला और देखे जाने वाले के बीच की दूरी धीरे-धीरे समाप्त होने की दिशा दिखाई गई है।
यही कारण है कि इस पूरे प्रसंग को केवल किसी दृश्य अनुभव की साधना मानना पर्याप्त नहीं है।
६. आत्मज्योति से नाद की ओर
इसके बाद प्रतीकोपासना का अगला चरण आता है नाद।
शिवसंहिता कहती है कि इस अभ्यास को निरंतर करने वाले साधक के लिए क्रमशः नाद उत्पन्न होता है।
नाद के कई स्वरूपों का वर्णन किया गया है।
प्रारंभ में वह मत्त भृंग के समान, फिर वेणु और वीणा के समान बताया गया है। आगे घंटानाद और फिर मेघगर्जन के समान ध्वनि का वर्णन आता है।
इन ध्वनियों का वर्णन साधक के अनुभव को समझाने के लिए किया गया है। ग्रंथ नाद को केवल एक स्थिर प्रकार की ध्वनि के रूप में नहीं बताता, बल्कि अभ्यास के क्रम में उसके विभिन्न स्वरूपों का उल्लेख करता है।
७. नाद में मन को स्थिर करना
नाद का अनुभव होने के बाद साधक को उस नाद में अपना मन लगाना है।
यहीं नाद-साधना का वास्तविक उद्देश्य सामने आता है।
साधक नाद को सुनकर केवल उसके अनुभव में रुचि नहीं लेता, बल्कि अपने चित्त को उसी में स्थिर करता है।
जब चित्त नाद में अत्यंत रमण करने लगता है, तब बाहरी विषयों का विस्मरण होने की बात कही गई है।
साधक का मन बाहर की वस्तुओं, ध्वनियों और विषयों की ओर पहले की तरह नहीं जाता। उसका चित्त नाद में स्थित होता है।
इस प्रकार नाद साधना में चित्त के एकाग्र होने का आधार बनता है।
८. नाद से लय
जब साधक का चित्त नाद में स्थिर होता है और बाहरी विषयों से उसका संबंध शांत होने लगता है, तब लय की अवस्था आती है।
लय यहाँ चित्त के शांत और विलीन होने की अवस्था के रूप में सामने आता है।
इसका क्रम बहुत स्पष्ट है
नाद का अनुभव → नाद में मन लगाना → चित्त की स्थिरता → बाहरी विषयों का विस्मरण → चित्त का शांत होना → लय।
इसलिए नाद को केवल एक आध्यात्मिक अनुभव मानकर रुक जाना इस साधना के उद्देश्य को पूरा नहीं करता। नाद का उपयोग चित्त को लय की ओर ले जाने के लिए किया जाता है।
९. चिदाकाश में विलय
इसके बाद शिवसंहिता साधना को और आगे ले जाती है।
अभ्यासयोग के द्वारा साधक विभिन्न गुणों को जीतकर और सभी आरंभों का त्याग करके चिदाकाश में विलीन होने की बात कही गई है।
टीका चिदाकाश को चैतन्यस्वरूप हृदयाकाश से जोड़ती है।
अब यदि हम प्रतीकोपासना की शुरुआत को याद करें, तो यहाँ पहुँचकर पूरी साधना का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है।
जहाँ शुरुआत हुई थी वहाँ साधक अपने बाहरी प्रतिबिंब को देख रहा था।
अब अंतिम अवस्था में वही साधना चैतन्यस्वरूप हृदयाकाश में विलय की बात कर रही है।
इस प्रकार पूरी यात्रा को एक ही दिशा में देखा जा सकता है
बाहरी प्रतीक से आंतरिक अनुभव की ओर।
१०. चार विशेष साधन
प्रतीकोपासना के इस पूरे वर्णन के अंत में शिवसंहिता चार साधनों को विशेष महत्व देती है।
पहला है सिद्धासन।
ग्रंथ कहता है कि सिद्धासन के समान कोई दूसरा आसन नहीं है।
दूसरा है कुम्भक।
कुम्भक के समान कोई दूसरा बल नहीं बताया गया है।
तीसरा है खेचरी मुद्रा।
खेचरी के समान दूसरी मुद्रा न होने की बात कही गई है।
और चौथा है नाद।
नाद के समान दूसरा लय नहीं बताया गया है।
इन चारों को प्रतीकोपासना के पूरे क्रम से जोड़कर देखें तो इनका स्थान स्पष्ट हो जाता है।
सिद्धासन शरीर की साधना से संबंधित है।
कुम्भक वायु-निरोध से संबंधित है।
खेचरी मुद्रा अंतर्मुख योग-साधना से संबंधित है।
और नाद चित्त के लय से संबंधित है।
११. पूरी प्रतीकोपासना एक क्रम में
अब शिवसंहिता के इस पूरे प्रसंग को बिना किसी चरण को अलग किए एक साथ देखें।
साधक पहले अपने स्वप्रतीक, अर्थात् अपने प्रतिबिंब को देखता है।
फिर उसी प्रतीक को आकाश में देखने का अभ्यास करता है।
निरंतर अभ्यास से प्रतीक का दर्शन पूर्ण होने लगता है।
फिर स्वप्रतीक का भान हृदयाकाश में होने की बात आती है।
इसके बाद साधक अपनी इंद्रियों को बाहरी विषयों से रोकता है।
वायु का निरोध करता है।
चित्त को भीतर स्थिर करता है।
आत्मा को ज्योतिरूप में देखने का अनुभव होता है।
आत्मतेज के दर्शन का वर्णन आता है।
निरंतर अभ्यास से देहादि के भाव से ऊपर उठकर आत्मा से अभिन्न होने की अवस्था बताई जाती है।
इसके बाद नाद उत्पन्न होता है।
नाद के विभिन्न स्वरूपों का अनुभव होता है।
साधक अपने चित्त को उसी नाद में स्थिर करता है।
बाहरी विषयों का विस्मरण होता है।
चित्त नाद के साथ शांत होता है।
लय उत्पन्न होता है।
और अंततः चिदाकाश में विलय की अवस्था बताई जाती है।
इस पूरे क्रम को संक्षेप में इस प्रकार रखा जा सकता है
स्वप्रतीक → आकाश में प्रतीक → हृदयाकाश → इंद्रिय-निरोध → वायु-निरोध → आत्मज्योति → आत्मस्वरूप → नाद → नाद में चित्त की स्थिरता → लय → चिदाकाश।
१२. प्रतीकोपासना का मूल स्वरूप
इस पूरे वर्णन को समझने के बाद प्रतीकोपासना को केवल “अपने प्रतिबिंब को देखने की साधना” कहना बहुत सीमित होगा।
प्रतिबिंब इसका प्रारंभिक आधार है।
साधक पहले उसी को देखकर अपनी दृष्टि और चित्त को स्थिर करता है। फिर उसी प्रतीक का अनुभव आकाश और हृदयाकाश से जोड़ा जाता है। इसके बाद साधना इंद्रिय-निरोध और वायु-निरोध के माध्यम से और अधिक अंतर्मुख होती है।
आगे आत्मज्योति का अनुभव आता है।
फिर साधना नाद तक पहुँचती है।
नाद में चित्त स्थिर होता है।
चित्त का लय होता है।
और अंततः चिदाकाश में विलय की बात कही जाती है।
इसलिए प्रतीकोपासना की पूरी दिशा स्थूल से सूक्ष्म और बाह्य से आंतरिक की ओर जाती हुई दिखाई देती है।
१३. अभ्यास पूरी साधना की आधारशिला
इस पूरे प्रसंग में एक बात लगातार दोहराई जाती है अभ्यास।
स्वप्रतीक के लिए अभ्यास।
आकाश में प्रतीक के दर्शन के लिए अभ्यास।
हृदयाकाश में उसके भान के लिए अभ्यास।
इंद्रिय-निरोध के लिए अभ्यास।
वायु-निरोध के लिए अभ्यास।
आत्मज्योति के अनुभव के लिए अभ्यास।
नाद के अनुभव के लिए अभ्यास।
और नाद में चित्त को स्थिर करने के लिए भी अभ्यास।
इसलिए शिवसंहिता में वर्णित यह साधना किसी एक क्षण के अनुभव पर आधारित नहीं दिखाई देती। यह एक क्रमिक और निरंतर साधना-पथ है।
एक चरण के स्थिर होने के बाद साधक अगले चरण की ओर बढ़ता है।
१४. अंतिम दृष्टि
प्रतीकोपासना की पूरी यात्रा को यदि एक ही दृष्टि में देखा जाए, तो इसकी शुरुआत और अंत के बीच एक गहरा अंतर दिखाई देता है।
शुरुआत में साधक अपने प्रतिबिंब को देख रहा है।
अंत में वही साधक चिदाकाश में विलय की अवस्था तक पहुँचने की बात कही गई है।
शुरुआत में आँखें एक दृश्य पर स्थिर हैं।
फिर ध्यान भीतर जाता है।
इंद्रियाँ शांत होती हैं।
वायु नियंत्रित होती है।
आत्मज्योति का अनुभव होता है।
फिर नाद साधना का आधार बनता है।
चित्त नाद में स्थिर होता है।
बाहरी विषयों का विस्मरण होता है।
और अंततः लय तथा चिदाकाश की अवस्था सामने आती है।
यही इस पूरे प्रसंग का मूल क्रम है।
स्वप्रतीक से आरंभ होकर आत्मज्योति तक, आत्मज्योति से नाद तक, नाद से लय तक और लय से चिदाकाश तक यह है शिवसंहिता में वर्णित प्रतीकोपासना की संपूर्ण यात्रा।
YT:- sanatan shruti ganga