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    कीमत
    by Dilbag Singh Virk

    कीमत “अभी तो मेरे हाथों की मेहँदी भी नहीं उतरी और आप...” - शारदा ने अपने आँसू पोंछते हुए डबडबाई आवाज़ में अपने पति राधेश्याम से पूछा, लेकिन राधेश्याम ...

    राहबाज - 12
    by Pritpal Kaur Verified icon

    रोजी की राह्गिरी (12) नयी ज़िंदगी आजकल अक्सर मैं काम घर पर मंगवा लिया करती हूँ. लगा आज तीनों यानी असिस्टेंट मेनेजर, सीए. और नजफ़ आये होंगे. नजफ़ पैकिंग ...

    भाग्य का खेल
    by sudha bhargava

    कहानी   भाग्य का खेल  सुधा भार्गव        "ओ आसरे –-रामआसरे -----।''    "ओह माँ !तुम्हारी आवाज क्या कमरे से रसोई में पहुँच सकती है?मुझे ही रामआसरे समझकर कोई काम बता ...

    दलित एक सोच - 1
    by adarsh pratap singh

    इस पुस्तक में उपयोग सभी किरदार सिर्फ शब्दो को बया करने के लिए उपयोग किये गए है उपयोगी किरदार का तालुख किन्ही मतभेदों को उत्पन्न करने के लिए नही ...

    औघड़ का दान - 4
    by Pradeep Shrivastava Verified icon
    • (4)
    • 24

    औघड़ का दान प्रदीप श्रीवास्तव भाग-4 अगले दिन उम्मीद के मुताबिक सीमा को ऑफ़िस में सोफी नहीं मिली। उसने उसे फ़ोन कर उसका हालचाल लिया तो सोफी ने बताया ...

    राय साहब की चौथी बेटी - 1
    by Prabodh Kumar Govil
    • (4)
    • 119

    राय साहब की चौथी बेटी प्रबोध कुमार गोविल 1 कॉलेज की पूरी इमारत जगमगा रही थी। ईंटों से बनी बाउंड्री वॉल को रंगीन अबरियों और पन्नियों से सजाया गया ...

    इस दश्‍त में एक शहर था - 7
    by Amitabh Mishra
    • 12

    इस दश्‍त में एक शहर था अमिताभ मिश्र (7) प्रजाखंड हुआ यूं था कि जब ब्रम्हचारी बाबा कन्नौज से इन्दौर एक बार जगह फाइनल कर के वापस लौटे तो ...

    कौन दिलों की जाने! - 10
    by Lajpat Rai Garg Verified icon
    • (2)
    • 46

    कौन दिलों की जाने! दस 24 जनवरी दोपहर में मोबाइल की घंटी बजी। रानी ने जब मोबाइल उठाया तो मकर संक्रान्ति के बाद आज आलोक का नाम देखकर उसके ...

    भोली की मां
    by Satish Sardana Kumar
    • (1)
    • 31

    भोली की माँभोली की माँ हिंदू की लड़की थी और सिख  की ब्याहता थी।उसने कोई प्रेम विवाह नहीं किया था बल्कि उसकी सामान्य शादी थी।उस जमाने मे हिंदू सुबह ...

    ठौर ठिकाना - 2
    by Divya Shukla
    • (1)
    • 19

    ठौर ठिकाना (2) घर पहुँचते पहुँचते देर हो गई. कमला ने खाने को पूछा भी मना कर दिया मैने. सुबह जल्दी जाना भी था बस एक कप चाय पी कर ...

    नाख़ून - 1
    by Vijay 'Vibhor'
    • 20

    उन दिनों बहुत कम घरों में फोन होते थे। सुविधानुसार लैंडलाईन पर बात करने के लिए मोहल्ले वाले अपनी रिश्तेदारियों में पड़ौसियों का नम्बर दे देते थे। ताकि अड़ी–भीड़ में ...

    मुख़बिर - 22
    by राज बोहरे
    • (2)
    • 26

    मुख़बिर राजनारायण बोहरे (22) हत्या अगले दिन दिन भर की थकान मिटाने पुलिस पार्टी के लोग एक पहाड़ी के शिखर पर टांगे फैलाए लेटे थे कि दूर पेड़ों की ...

    माँ... तुम मेरी आदर्श नहीं हो
    by Trisha R S
    • (1)
    • 22

     माँ तुम  मेरी आदर्श नहीं हो... मेरी प्रेणना हो..... बात जरा सी  आप  लोगों को  खल रही होंगी  की कोई बेटी अपनी ही माँ को ऐसा कैसे और क्यूँ बोल सकती ...

    कौन दिलों की जाने! - 9
    by Lajpat Rai Garg Verified icon
    • (10)
    • 95

    कौन दिलों की जाने! नौ मकर संक्रान्ति मौसम ने करवट बदली। कुछ दिन पहले तक जहाँ सर्दी की जगह गर्मी का अहसास होने लगा था, अब दो—तीन दिन से ...

    राहबाज - 11
    by Pritpal Kaur Verified icon
    • (3)
    • 52

    रोजी की राह्गिरी (11) आसमान में छलांग यूँही अनुराग से मिलते उसके प्रेम में भीगते डूबते-उतरते ऐसे ही जीवंत दिन बीत रहे थे कि मुझे अपनी देह में कुछ ...

    रेलगाड़ी में रीछ
    by Kailash Banwasi
    • 22

    रेलगाड़ी में रीछ कैलाश बनवासी मैं इलाहाबाद जा रहा था।सारनाथ ए क्सप्रेस से। अकेले। अकेले यात्रा करना बड़ा ‘बोरिंग' काम है।उनके लिए तो और भी कष्टप्रद होता है जो ...

    औघड़ का दान - 3
    by Pradeep Shrivastava Verified icon
    • (10)
    • 76

    औघड़ का दान प्रदीप श्रीवास्तव भाग-3 ‘हूं .... तुम्हारी सोफी की ज़िंदगी में बड़े पेंचोखम हैं। मायका-ससुराल नाम की कोई चीज बची नहीं है। ले दे के जुल्फ़ी और ...

    अब जाग जाओ
    by सिद्धार्थ शुक्ला
    • 8

    #अब_जाग_जाओ_भाग१हल्की ठंड के मौसम में जब साफ आसमान होता है तो चंद्रमा की चांदनी अपना अलौकिक रूप लिए बरस रही होती है । चांदनी रात में किसी बगीचे में ...

    वर्चुअल गर्लफ्रेंड
    by r k lal Verified icon
    • (6)
    • 103

    "वर्चुअल गर्लफ्रेंड" आर0 के0 लाल               दिल्ली से चेन्नई जाने वाली तमिलनाडु एक्सप्रेस के थर्ड एसी कोच के एक कंपार्टमेंट में बीच वाली बर्थ पर एक लड़की अपनी ...

    इस दश्‍त में एक शहर था - 6
    by Amitabh Mishra
    • 20

    इस दश्‍त में एक शहर था अमिताभ मिश्र (6) हम वापस अपने कथा सूत्र को पकड़ते हैं। और विनायक भैया के कुछ पहलू जानने की कोशिश करते हैं। विनायक ...

    बेघर सच
    by Sudha Om Dhingra
    • (1)
    • 26

    बेघर सच सुधा ओम ढींगरा ''सच तो मैं जानता हूँ। वह सच मैं तुम से उगलवाना चाहता हूँ; जिसे तुम मुझ से छिपा रही हो।'' संजय बड़ी कठोरता से ...

    कौन दिलों की जाने! - 8
    by Lajpat Rai Garg Verified icon
    • (5)
    • 110

    कौन दिलों की जाने! आठ सुबह की चाय का समय ही ऐसा समय था, जब रमेश और रानी कुछ समय इकट्ठे बैठते और बातचीत करते थे। लोहड़ी से तीन—चार ...

    राहबाज - 10
    by Pritpal Kaur Verified icon
    • (1)
    • 59

    मेरी राह्गिरी (10) नयी दोस्ती मेरा घर अब काफी संभल गया था. निम्मी और मेरे बीच जो दूरी धीरे-धीरे आ गई थी वो काफी हद तक दूर हो गयी ...

    औघड़ का दान - 2
    by Pradeep Shrivastava Verified icon
    • (6)
    • 135

    औघड़ का दान प्रदीप श्रीवास्तव भाग-2 जब काम निपटा कर पहुंची बेडरूम में तो साढे़ ग्यारह बज रहे थे। बच्चे, पति सोते मिले। एक-एक कर दोनों बच्चों को उनके ...

    ठौर ठिकाना - 1
    by Divya Shukla
    • (1)
    • 35

    ठौर ठिकाना (1) आज दिन भर की भागदौड़ ने बुरी तरह थका दिया था मुझे. घर में घुसते ही पर्स बेड उछाल दिया और सीधे वाशरूम में घुस गई. ...

    मुख़बिर - 20
    by राज बोहरे
    • (2)
    • 55

    मुख़बिर राजनारायण बोहरे (20) मुठभेड़ मजबूतसिंह उस दिन अपने कंधे झुकाये जमीन पर आंख गढ़ाये हुए आता दिखा तो हम सबको उत्सुकता हुई । कृपाराम लपक के मजबूतसिंह से ...

    परिवर्तन की लहर
    by Anju Gupta
    • (2)
    • 126

    मुक्ता लगभग 25 वर्ष की थी और शहर के नामी कॉलेज में अंग्रेजी विभाग में लेक्चरर थी l विभाग में ज्यादातर लोग बड़ी उम्र के थे , इसलिए उसका ...

    राहबाज - 9
    by Pritpal Kaur Verified icon
    • (3)
    • 68

    निम्मी की राह्गिरी (9) वो छिप छिप कर मिलना दोनों डब्बे उठाये अनुराग के बारे में सोचती मैं घर चली आयी थी. घर आ कर माँ को मिठाई वाला ...

    काश! ऐसा होता.....
    by Sudha Om Dhingra
    • (1)
    • 105

    काश! ऐसा होता..... सुधा ओम ढींगरा पति की नौकरी ही ऐसी थी कि देश-देश, शहर-शहर घूमते हुए अंत में, हम भूमण्डल के एक बड़े टुकड़े के छोटे से हिस्से ...

    गाली की धिक्कार
    by मन्नू भारती
    • 61

    भारी कदमों के साथ वह आगे बढ़ा। जीवन में यह पहला अवसर नहीं था जब वह अपमानित हुआ या मानसिक प्रताड़ना के दंश ने उसके आंतरिक मन को कटिले ...