फिर भी शेष - 5

फिर भी शेष

राज कमल

(5)

समय का चक्र कब रुका है— महामारी हो, ज्वारभाटा आए... विषाद की गहन छाया हो या हंसी—खुशी के पर्व... एकांत में सिसकती जिंदगी हो या सार्वजनिक उत्पीड़न,

चक्र नहीं थमता। रुकेगा तो फिर गति नहीं होगी। जब गति नहीं तो जीवन कहां? जीवन, सत्य और सिर्फ सत्य कहें तो गति—चक्र निरंतर सापेक्ष को कलवित कर उसे गूंथता, लुगदी बनाता, अतीत की प्रक्रिया में इतिहास के कागज बनाता चलता है। हादसे के निशान उसके बाद उसकी प्रभावकारी शक्ति के अनुसार कम या देर तक रहते हैं। हिमानी का अतीत हादसों की ‘बारहमासी' है। कलेंडर के पन्ने की तरह उतर जाती हैं घटनाएं...

उस दिन नरेंद्र को थाने से छुड़ाने में ज्यादा मुश्किल नहीं आई, क्योंकि चोट उसी को लगी थी। फिर भी आर्थिक हानि और अपने साथ हुई बदसलूकी हिमानी के लिए काफी कष्टदायक थी। थानेदार तो था नहीं, हेडकांस्टेबल ने ही रुपये जेब के हवाले करते हुए हिदायत दी थी कि ‘संभाल के रख इसे...सुना है ऐसे ही झगड़ा—फसाद करता है, साला नशाखोर भी है। सप्लाई भी जरूर करता होगा। किसी दिन धर लेंगे हरामखोर को सबूत समेत...तब क्या देकर छुड़ाएगी, सिर्फ हाथ जोड़ने से नहीं चलेगा...' उसने ऊपर से नीचे तक हिमानी के शरीर का जैसे एक्सरे करते हुए आंखें नचार्इं... दूसरे कांस्टेबल ने भी ‘ही...ही' करके दांत दिखाए, बोला ‘‘जनाब! जो आप चाहोगे, दे देगी...अब बेटे से ज्यादा प्यारी कौन—सी चीज है, जिसे बचाएगी...जा, ले जा इसे...'' उसने हिमानी को संकेत किया।

नरेंद्र सिर झुकाए खड़ा था। उसके जबड़े कसे हुए थे। चेहरे और बाजू पर खरोंचें थीं, जिन पर लाल दवाई लगाई गयी थी।

नरेंद्र उसके साथ नहीं आया था। बोला तक नहीं, गुस्से से उसे घूरा जरूर था। तेज़ कदम चलता हुआ बाजार की भीड़ में कहीं खो गया।

नरेंद्र रात को भी घर नहीं लौटा था। चूंकि कमला का बड़ा लड़का खबर ले आया था कि नन्नू थाने से छूट गया है। इसलिए घर में स्थिति सामान्य थी। हां, सास ने जरूर इतना कह सुनाया, ‘‘अरे, दुलार—पुचकार के साथ ले आती तो कौन—सा घट जाती...ऐसी हालत में जाने कहां मारा—मारा फिरेगा...''

‘‘इतना ही प्यार टपक रहा था तो खुद क्यों नहीं गर्इं...बस ताने मारने ही आते है। न बाप को फिकर है, न किसी और को। जो करूं सो मैं...फिर भी चैन नहीं।'' इतना कहकर हिमानी ने दरवाजा बंद कर लिया। सास देर तक घरघराती आवाज में उसे कोसती रहीं थी।सुखदेव देर रात नशे में लौटा तो आंय—बांय बकने लगा। नन्नू को ही भला—बुरा कहते हुए उसकी ओर इशारा करता, ‘‘यह सब...सब तेरी वजह से...ये कि तू ही जड़ है... इस घर को मटियामेट...

मरने दे हरामी को...वहीं डंडे पड़ेंगे तो अकल ठिकाने आ जाएगी... कहता है, मैंने क्या दिया? ये कि कैसा बाप ...और तुझे महारानी कहता है। वाह—वाह! महारानी जी...''

और भी बहुत कुछ बोला उसने, जिसका लब्बोलुआब हिमानी ने जान लिया कि

किसी ने स्टैंड पर हिमानी का अपमान किया होगा, तभी नन्नू से बर्दाश्त नहीं हुआ

और मार—पीट कर बैठा। उसका मन हुआ, इस निर्लज्ज आदमी पर थूक दे, जो उसका पति कहलाता है और पत्नी की बेइज्जती को चुपचाप पी जाता है शराब के घूंट की

तरह... कुछ न सही, पर बेटा गैरतमंद तो है। अनायास हिमानी का जी नन्नू के लिए प्यार से लरज आया। इच्छा हुई, उसे दुलारे—चूमे, छाती से लगाए। अभी बाहर जाकर उसे ढूंढ़ लाए, पर रात बहुत हो रही थी। निरपेक्ष रितु दूसरे कमरे में पत्रिका के पन्ने पलट रही थी। हिमानी पूछना चाहती थी कि पिकनिक कैसी रही, पर रितु ने पत्रिका, किताबों के ढेर में दबा दी और बिस्तर में घुस गई। बुदबुदाकर इतना ही कहा, ‘‘इस घर में कभी शांति हो ही नहीं सकती...''

दूसरे दिन नरेंद्र घर आया था। आते ही हिमानी के प्यार भरे उछाह पर उसने पानी डाल दिया। बोला, ‘‘तू क्यों गई थी थाने...बाकी सब क्या मर गए थे... जरूरत भी क्या थी... क्या करते वे? बंद कर देते तो ठीक था...यहां क्या सूना हो जाता मेरे बगैर।'' उसका यह रूप देख कर ताई और दादी खामोश थीं। हिमानी को फिर भी मन ही मन सुकून का अहसास हो रहा था। नन्नू के क्रोध के बीच, हिमानी के हुए अपमान के लिए विवशता थी। उसका दुखः था कि उसके कारण थाने में उसे भी ज़लील होना पड़ा।' तभी अचानक बीच में आकर रितु ने नन्नू को झिड़क दिया था, ‘‘अरे वाह! एक तो तुझे छुड़ाया और तू उल्टा मौसी को ही भला—बुरा कह रहा है...अपनी तरफ तो देखता नहीं, कहां—कहां आवारागर्दी करता घूमता है... कैसे लफंगों के साथ... हुं... उल्टा चोर कोतवाल को डांटे...।''

हिमानी ने रितु को रोका था, किंतु तब तक नरेंद्र आक्रामक मुद्रा में आ गया।

‘‘बड़ी आई सीख देने वाली...तू कहां—कहां घूमती है, क्या मुझे नहीं मालूम? कैसी पढ़ाई करती है कालेज में, सब जानता हूं। मैं तो हूं आवारा लफंगा! किसी का दिया खाता हूं?'' रितु कुछ और बोलने को थी कि हिमानी ने रोक दिया।

कुछ शंकित हो गई है हिमानी। यों तो उस दिन का वार्तालाप भाई—बहन के बीच बचकाना द्वेष भर लगा था, किंतु रितु को लेकर वह अब ज्यादा ही सोचने लगी है, ‘कहां—कहां घूमती है...कैसी होती है पढ़ाई?' ये शब्द क्या व्यंजना कर रहे हैं?

कैसी नादान है वह, इस ओर उसका ध्यान ही नहीं गया। रितु जवान हो रही है, पंख तोलने के दिन हैं उसके... देख रही हूं, चुप रहने लगी है, अक्सर पत्रिकाएं पलटती रहती है। शीशे के सामने ज्यादा समय गुजारती है और उस दिन कैसा पटर—पटर बोल रही थी, ‘सर कहते हैं— टीन—एज में ऐसा होता है, लगता है हम बदल गए हैं...अंदर—बाहर एक महक पागल बनाने को आतुर लगती है...ये प्यार के सिमटस्म हैं...दुनिया को पा लेने की चाह...प्रकृति के अदम्य उछाह में स्वयं को खो देने वाला जुनून।'

हे ईश्वर! उसने इतना साफ़—साफ़ कहा और मैं अपने ही भीतर के शहर में बहती नदी के पुल पर खड़ी मंदिर की घंटियां सुनती रही। अब जवान बेटी की मां का दायित्व निभाना है। किसी ऊंच—नीच से पहले ही उसकी शादी...' इस ख्याल पर हंस पड़ी हिमानी।

वही सनातन मां की छवि! ब्याह होने तक उसके सतीत्व की हिफ़ाजत और फिर मुक्ति का अहसास... उधर चाहे बेटी के अस्तित्व की रोज बलि चढ़े, सतीत्व का बाजार लगे या मन के बीहड़ में अकेली प्रताड़ित, आत्महंता कगार से चिल्लाए, बचाओ बचाओ मुझे...! तब सब ओर से एक मत मां—पिता—भाई—भावज अन्य संबंधी उसे सांत्वना देते हैं, ‘तुम्हारा आगा—पीछा, लोक—परलोक, घर—ठिकाना सब वहीं है। वहां से अर्थी पर सवार होकर ही निकलना, पहले नहीं... हमने तुम्हें दान कर दिया है। दान की हुई वस्तु वापस लेने का विधान हमारे धर्म में नहीं है। तुम पराई हो चुकी हो। समाज का चलन हम भला कैसे बदल सकते हैं...पाप के भागी बन जाएंगे...'

छन्नऽऽऽ...से गिलास हाथ से छूटकर फर्श पर गिरा और छोटी—छोटी किरचों में तब्दील हो गया। पीने के लिए भरा गिलास होठों तक पहुंचने से पहले ही हाथ से छूट गया था। उधर सोच का सिरा छूटा तो वह धम्म से कुर्सी पर बैठ गई। स्टाफ रूम में उपस्थित दो टीचर ‘क्या हुआ क्या हुआ' कहती हुर्इं उसके पास आयीं। खुद को सहेजकर मुस्करायी हिमानी, ‘कुछ खास नहीं, प्यास लगी थी।'

एक—दूसरे को देखकर दोनों ने कंधे उचकाए। एक बोली, ‘‘तो दूसरा गिलास ले लो।'' फिर ठहाका लगाते हुई बाहर निकल गर्इं। हिमानी ने अपने आप से सुना ‘एक प्यास निरंतर है, एक आस बराबर, हाथों की लकीरें है, मिटाऊं भी तो कैसे।'

कहीं पत्ता भी हिले और स्कूल की प्रशासनिक अधिकारी मिसेज वंदना सलूजा वहां न पहुंचें, यह असंभव था। उनकी सूंघने और सुनने की शक्ति गजब की थी।

कमरे में पहुंचने से पहले ही चिल्लार्इं ‘‘क्या हो रहा है?'' फिर सारा दृश्य समझ कर कहने लगीं, ‘‘लापरवाही...इससे तुम्हें चोट भी लग सकती थी...स्कूल की प्रापर्टी का लॉस तो हुआ ही। हम स्कूल की तरक्की और उसकी प्रोपर्टी की परवाह नहीं करेंगे तो स्कूल हमें ‘सैलरी' कहां से देगा... सोचिए, यह पूरी ‘गिव एण्ड टेक' वाली इक्वेशन है... क्यों हिमानी, क्या मैं गलत कह रही हूं?''

हिमानी ने उनके समर्थन में धीरे से गर्दन हिला दी। उनसे बचने का यही एक तरीका है। चुपचाप सुनो, बिना प्रतिवाद किए, और जब वे अंत में कहें कि ‘क्या मैं गलत कह रही हूं?' तब उनका समर्थन कर दो कि आप गलत नहीं कह रहीं। स्कूल के ‘प्रिसिंपल— कम—प्रोप्राइटर' की सगी बहन हैं, कुछ प्रतिशत का मालिकाना हक भी रखती हैं।

मिसेज वंदना ने कड़ककर एक ‘चपरासी—कम—सफाई—कर्मी' को पुकारा और सफाई का आदेश देकर जाने लगीं तो उन्हें कुछ याद आया तो वह कुछ पल ठहरीं और फिर चलते—चलते हिमानी से कह गर्इं, ‘‘आज की क्लासेज समाप्त होने पर प्रिंसिपल साहब से मिल कर जाना।''

प्रिंसिपल बी.आर. कक्कड़ से मिलकर जब हिमानी घर लौट रही थी, तब कुछ अहम फैसले लेने की अकुलाहट उसे बेचैन किए हुए थी। प्रिंसिपल ने कुछ नया नहीं कहा था। ऐसे संकेत उसने पहले भी किए थे। आज भी कहा, ‘‘हम पर बहुत दबाव बढ़ रहा है मिस हिमानी। प्रशासन कहता है कि सभी टीचर क्वालिफाइड हों...बी—एड इज मस्ट नाउ। वेतनमान का मानदण्ड निर्धारित करने की बात है क्वालिफाइड टीचर के लिए... दूसरी ओर अभिभावक संघ ने हमारे विरुद्ध मोर्चा खोल लिया है। वे बढ़ी हुई फीस के मामले को कोर्ट ले जा रहे हैं...तुम हमारी मजबूरी समझ सकती हो... आफ्टर ऑल हम भी कुछ कमाने के लिए बैठे हैं... बेहतर होता कि किसी और बिजनेस में हाथ डालते।''

हिमानी चुपचाप सुनती रही। चपरासी चाय के दो कप रख गया था। कक्कड़ साहब ने आगे कहा, ‘‘आई थिंक! यू अंडरस्टैंड माई प्वाइंट, मैं जानता हूं, तुम बहुत शालीन हो... अपने सब्जेक्ट पर पकड़ भी है तुम्हारी, बट यू नो...आजकल लोग सिर पर इतनी डिग्रियां लिये घूमते हैं कि हम उन्हें ‘इग्नोर' नहीं कर सकते... तुम जब भी क्वालिफाई करो, फौरन चली आना! मैंने दयाराम भाई को समझा दिया है...वे तुम्हारे लिए कुछ और इंतजाम कर देंगे। वे तुम्हारे ज्यादा करीब हैं। हमें तो तुमने सिर्फ चेयर परसन ही समझा...''

हिमानी भी जानती है कि प्रिंसिपल बी.आर. कक्कड़ वाकई मजबूर हैं। पच्चीस वर्ष पहले एक कमरा किराये पर लेकर उन्होंने अपने ‘स्कूल—बिजनेस' की स्थापना इसलिए तो नहीं की थी कि बिना ‘शिक्षा शास्त्री' बने हिमानी सेकेण्डरी स्कूल की अध्यापिका बन जाए। बनी भी रह सकती थी, यदि प्रिंसिपल कक्कड़ के एकांत में छूने और उसकी फिगर की प्रशंसा कर देने पर वह चौकन्नी होकर माथे पर बल डालने की बजाय मुस्करा कर कह देती, ‘थैंक्यू सर।'

‘दयाराम भाई उसके ज्यादा करीब हैं।' कितने करीब हैं? यह प्रश्न उसने स्वयं किया, अपने आप से...' उत्तर में मन को टटोला और खुद ही मुस्करा उठी, ‘उफ्‌! कैसे जाले बनाते रहते हैं ये बूढ़े मकड़े।' वह बुदबुदाई, ‘पर सभी बूढ़े—मकड़े नहीं होते।' उसके अंतर ने स्वयं तर्क किया। फिर वह याद करने लगी कि वह ऐसे कितने बूढ़ों को जानती है, जो ‘मकड़े' नहीं लगे। इस क्रम में उसे और मकड़े भी याद आते गए। नौकरी की तलाश में उसका ऐसे कई मकड़ों से वास्ता पड़ा था। ‘मैटल इंडस्ट्रीज' का ‘बड़ा साब', ‘कैमिकल डायर्स' का प्रोपराइटर बूढ़ा सरदार... और तभी काशी बाबा का बूढ़ा चेहरा उसकी आंखों के सामने घूम गया। हर पूर्णमासी के दिन गली में उसका फे़रा ज़रूर लगता था। जब से हिमानी इस घर में आई है, बाबा की निरंतरता में उसने कमी नहीं देखी। यूं तो उनकी गली में और भी अनेक साधू आते हैं—एक ‘जटाधारी', एक ‘गोला बाबा' और एक ‘काना फकीर', लेकिन काशी बाबा की बात ही अलग थी। मितभाषी, मृदुभाषी, लंबा कद, दाढ़ी—मूंछों से भरा—भरा सौम्य चेहरा। चेहरे पर बड़ी—बड़ी आवदार आंखें। एक कंधे पर झोली, दाएं हाथ में सोंटा रहता था। भगवा कुरता—लुंगी के ऊपर गले में रामनामी लिपटी रहती थी। शुरू में सुखदेव की मां ने ही मिलवाया था, ‘बाबा, यह छोटी बहू की ही बहन है। बच्चों की खातिर इसी से लगन कर दिया सुखदेव का...आशीर्वाद दो इसे।'

काशी बाबा कुछ पल उसे देखते रहे, लेकिन बोले कुछ नहीं। फिर थोड़ा मुस्कराकर आशीर्वचन के रूप में अपने दोनों हाथ ऊपर उठा दिए थे उसकी ओर। वे कभी—कभी सास के पास कुछ मिनट बैठ जाते। सास दुनिया—जहान की उलझनों और प्रश्नों का ढेर उनके सामने लगा देती। वे जाने क्या—क्या कहते। कभी—कभी काशी बाबा हाथ की लकीरें भी पढ़ते थे, लेकिन दूर से ही। दिखाने वाले का हाथ कभी नहीं पकड़ते थे। उस चेहरे से हिमानी को कभी मकड़े की आकृति याद नहीं आयी।

धीरे—धीरे बाबा से निजता—सी जुड़ गई। हर पूर्णमासी जैसे काशी बाबा के आने से ही पूरी होती थी। द्वार पर आकर उनका यह बोलना— ‘दे दाता...बाबा को दे...' फिर कभी—कभी धीरे—धीरे गुनगुनाने लगते, ‘तेरा भरा रहे भंडार, कटोरा सार्इं का भर दे।'

जब कभी भंडारे के लिए भी दान की इच्छा करते तो सुखदेव की मां अवश्य दान देती थीं। हिमानी से भी जो बन पड़ता, करती थी, लेकिन जेठानी कमला के पास बाबा कभी नहीं जाते थे।

परिवार के सदस्य के रूप में जब हिमानी का परिचय बाबा से बढ़ गया तो उसने एक दिन अपनी मुश्किलों से बाबा को अवगत कराया और आगत की रूप—रेखा जानने की उत्सुकता दिखाई थी। बहुत देर तक बाबा मुस्कराते तो रहे, लेकिन बोले नहीं। मन की निराशा से जब हिमानी की आंखों में पानी भर आया तो...काशी बाबा शांत किंतु गंभीर स्वर में बोले थे, ‘‘तू पुण्यात्मा है बेटी! इसीलिए दुःखी है, क्योंकि सबके दुःख तेरे अपने हैं। महान आत्माएं ही ऐसा अनुभव करती हैं। तू किसी को कष्ट नहीं पहुंचाएगी, यही तेरे संतोष का फल है, तेरा वैभव है।'' वे गौर से उसका चेहरा देखते हुए बोले जा रहे थे, ‘‘दुःख में ही लीन हो जा, पर मिटेगी नहीं तू...बची रहेगी, अवश्य।''

हिमानी आंखें पोंछती रह गई थी।

एक बार उसने बाबा को नाश्ते का आमंत्रण दिया था, किंतु काशी बाबा किसी घर में कुछ खाते नहीं। जिस घर से अपेक्षित है, भिक्षा मांगकर लौट जाते हैं। कहां लौटते हैं, कोई नहीं जानता। अपनी—अपनी राय है सबकी। कोई कहता, हरिद्वार में इनका भव्य मंदिर है, कोई कहता, बनारस में इनका डेरा है। कुछ महीने घूम—फिर कर वहीं लौट जाते हैं। उस दिन काशी उसके घर बैठे तो हिमानी ने अपनी बायीं हथेली उनके सामने फैला दी।

सोचते—सोचते सचेत होकर हिमानी ने बस में आस—पास चोर नजरों से देखा— कहीं कोई उसे ‘नोटिस' तो नहीं कर रहा। सचमुच, एक लड़का उसे मुग्धभाव से देख रहा था। वह झेंप—सी गई और मुंह खिड़की की ओर फेर लिया। मुंह फेर लेने से मुश्किलें तो नहीं मिट जातीं, यह हिमानी को मालूम है। बजाय इसके कि समस्या से अनजान बने रहें और वह इतनी बढ़े कि अस्तित्व को ही खतरा बन जाए...क्यों न हम उसकी आंखों में आंखें डालकर उसे पीछे हटने को विवश कर दें।

वह स्कूल छोड़ देगी और जीविका के लिए अपना ही कोई स्थायी साधन बनाएगी। जहां और लोग उसमें अपनी आजीविका पा सकें। इसमें अभी वक्त लगेगा...पर शुरुआत शीघ्र ही करना होगी। पहले सोचा था कि रितु को जल्दी ही ब्याह कर, मुक्त हो लेगी और तब नए सिरे से अपने बारे में विचार करेगी...नए कोण से देखेगी स्वयं को, किंतु अब सोचती है कि रितु जब तक पढ़ना चाहेगी, वह पढ़ाएगी...उसका कैरियर बनाने में मददगार बनेगी। जब तक स्वयं रितु नहीं चाहेगी, तब तक उसकी शादी का ख्याल भी मन में नहीं लाएगी। साथ—साथ अपने लिए नई राह भी खोजेगी...हाथों की लकीरों के खिलाफ कुछ और रेखाएं खींचेगी...

भाई को दो पत्र लिख चुकी है, लेकिन अभी तक कोई जवाब नहीं आया है। अच्छा है, कम से कम एक ओर से तो फैसला करने में सुविधा हुई। अब और पत्र नहीं लिखेगी। उसे अफसोस होता है कि पत्र लिखा ही क्यों? उनसे कहकर अपने आपको और छोटा कर लिया। हंसते होंगे सब, ‘बड़ा गुमान दिखाती थी कि अब कोई संबंध नहीं रखेगी। कहती थी, ‘अपने—अपने स्वार्थ के लिए मुझे कुएं में धकेल दिया...आखिर संबंध याद आ ही गए...बिना हमारी मदद के बेटी नहीं ब्याही गई...'

सुर्इं की नोक बाएं हाथ के अंगूठे में चुभी थी। हल्की कराह के साथ हिमानी की तंद्रा भंग हो गई। अंगूठे के पोर पर खून की बूंद लाल मोती—सी दिख रही थी। अंगूठा मुंह की ओर उठ ही रहा था कि हाथ रुक गया। एक कतरन उठाकर उसने खून पोंछ दिया, पर खून का मोती फिर उग आया अंगूठे पर। उसने फिर पोंछा। मोती बार—बार उग रहा था। हिमानी बार—बार पोंछ रही थी।

‘‘गीली पटट्‌ी बांध लो मनी...?'' हिमानी हड़बड़ा गई, ‘‘कौन बोला? कहां से बोला?'' द्वार पर वैद्य दयाराम खड़े थे। वह सोच में पड़ गई, ‘न जाने कब से खड़ा देख रहा है मुझे, इस हाल में...मुझे पता कैसे नहीं चला? क्या सोचता होगा।' उसके हाथों ने यंत्रवत आंचल ठीक किया और नजरें नीची किए—किए बोली, ‘‘आइए वैद्य जी! आप कब आए?''

‘‘ज्यादा देर तो नहीं हुई, लेकिन तुम तो यहां थी ही नहीं। समझे कि न जाने कहां थीं, गुमसम, खोई—खोई!।''

‘‘नहीं—नहीं, बस ऐसे ही...'' वह झेंपती—सी मुस्कराई।

‘‘रितु बिटिया दिखाई नहीं दे रही...समझे कि घर में कोई नहीं है क्या?'' उन्होंने इधर—उधर झांकने का जैसे अभिनय किया।

‘‘कॉलेज गई है... नन्नू के पापा बाजार में होंगे...।''

‘‘हूं... मैं सोचता हूं सुखदेव की तो बहुत कुछ कट गई...पर नन्नू अभी बच्चा है...उसे कुछ करना चाहिए। समझे कि इतनी छोटी उम्र में तुम सबके लिए इतना कर रही हो और अपने लिए सोचती तक नहीं...मैंने अनेक बार उसे बुलवाया है...समझे कि पर आता ही नहीं। सोचा था, फैक्टरी में काम कर लेगा...या फिर दवाखाने पर मेरे साथ बैठेगा तो कुछ सिखा दूंगा...दवा की पुड़िएं ही बांधने लगता...''

‘‘कैसे आना हुआ...'' हिमानी ने उसकी बातों का क्रम तोड़ा। वह चाहती थी कि वैद्य दयाराम जल्द से जल्द काम की बात करे और दफा हो जाए। उसने सोचा, ‘जिठानी के कान इधर ही लगे होंगे...या छोटे लड़के को भेज देगी किसी बहाने से...धागा लेने या बटन मांगने...और फिर सास के कान में जाकर पिरो आएगी एक की चार बनाकर।

‘‘कहलवा दिया होता...मैं ही आ जाती।''

कुर्सी पर उन्होंने पहलू बदला और ‘हें! हें!' करके हंसे, ‘‘अरे भई, हम बुजुर्गों के लिए जवान लोगों के पास वक्त ही कहां है। जिसे जरूरत है, वही आएगा, जैसे प्यासा कुएं के पास समझे कि...'' वैद्य की नजर ऐसी थी कि हिमानी सिहर कर रह गई।

काम की गरज न होती तो क्या मज़ाल कि खूसट इधर का रुख भी कर पाता। कई सालों से उसका काम कर रही है। भला बोलता है, वक्त पर पैसे दे देता है। आपतकाल में मदद को आगे आ जाता है। कक्कड़ साहब से दोस्ती का वास्ता देकर स्कूल नौकरी भी इसी ने दिलवाई थी।

कहता है, ‘मनी, तू नहीं जानती तेरे ससुर महादेव बाबू का बड़ा अहसान है मुझ पर...वही उतारने की कोशिश में रहता हूं कि इस घर के लिए कुछ करूं। पेशावर से यहां लुटे—पिटे आए थे! पल्ले कुछ खास नहीं था। सरकार ने जो दिया, सो दिया— मेहनत भी बहुत की। मजदूरी की, पटरी लगाई, लेकिन महादेव भाई की मदद और उनका अपनापन बहुत काम आया। मैंने दो मशीनें रखकर काम शुरू किया था। सरकारी दफ्तरों के मामले में मदद की महादेव ने। सब काम बनते चले गए। समझे कि आज इतना बड़ा कारोबार बेटों ने संभाल लिया तो अपने पुराने हुनर का शौक पूरा कर रहा हूं। कुछ हाथ में शफा है, समझे कि कुछ ऊपर वाले का करम। समझे कि दवाखाना भी चल गया।'

यह सब तो ठीक है। फिर भी, जाने क्या बात है कि हिमानी उसकी आंख से आंख नहीं मिला पाती। इस उम्र में भी कैसे तो देखता है कि अंदर तक हिल जाती है वह।

वैद्य जी कह रह थे, ‘‘लड़के से बात हुई थी...आर्डर जल्दी का है...समझे कि किसी नौकर को मत भेजना, मैं ही हो आऊंगा। सुखदेव की मां से भी मिल आऊंगा

...समझे कि बहुत दिन हो गए...''

वैद्य जी को सहसा कुछ याद आया और अपने हाथ में लिपटा पैकेट उसकी ओर बढ़ाकर बोले, ‘‘लो, यह देखो, यह पीस उल्टा—सीधा कर दिया तुमने। पिछले ऑर्डर का है।'' हिमानी ने कपड़ा उलट—पलट कर देखा, बात सही थी। वैद्य जी कह रह थे, ‘‘आज तो अपनी आंखों से देख लिया, समझे कि कैसे काम करती हो खोई—खोई...समझे कि, काम तो खराब होगा ही।''

उसके चेहरे पर बेचारगी उतर आई। ‘क्या करे, मन उचट जाता है...सब गड़बड़ा जाता है। लाख जतन करने पर भी नहीं संभलता...कब तक होता रहेगा ऐसा? मांझी है कि साये—सा चिपका है। रितु कहती है, साइक्रेटिक को दिखाना चाहिए। पागलपन के लक्षण हैं। मैं तो चाहती हूं कि हो जाऊं पागल ...भूल जाऊं सब कुछ, मर जाएं सब अहसास।'

‘‘अब क्या सोचने लगीं...समझे कि भई, हद हो गई मनी,'' हठात वैद्य जी बोले, ‘‘क्यों इतना कष्ट दे रही हो अपने आपको...समझे कि उस पर भरोसा रखो। सब ठीक हो जाएगा। समझे कि...''

‘‘नहीं—नहीं, सोचूंगी क्या? सिलाई छोड़ दूंगी...नुकसान हो जाता है...''

‘‘लो! मैंने ऐसा क्या कह दिया, समझे कि...तुम भी बस...! पहले बच्चे छोटे थे तो हमारा ही काम करती थीं। बच्चे बड़े हो गए...तुमने नौकरी भी कर ली। समझे कि हमारा काम ‘पार्ट—टाइम' हो गया...और अब कहती हो, बिल्कुल छोड़ दूंगी...और हां, कक्कड़ ने बताया कि तुम्हें स्कूल से हटा रहा है, समझे कि कुछ मजबूरियां हैं। ऐसे में यह काम भी...?''

हिमानी को लगा, इतनी देर तक रुकने पर भी चाय—पानी न पूछना अशिष्टता होगी।

‘‘आप बैठिए, मैं चाय बना लाती हूं...''

‘‘अरे नहीं! मनी, बैठो—बैठो, समझे कि चाय—वाय रहने दो... तुम से बात करके थोड़ा अच्छा लगता है, इसीलिए बैठ जाता हूं...''

‘‘और हां, काम की चिंता बिल्कुल मत करना...समझे कि..., इतने साल का रिश्ता है...कभी देर—सबेर, आगा पीछा हो ही जाता है, समझे कि..., मैंने तो यूं ही कह दिया प्यार से,...क्या इतना भी हक नहीं है मुझे... बोलो?''

वैद्य जी के इस रिश्ते और प्यार का क्या उत्तर देती हिमानी। सकुचाकर कह दिया, ‘‘है क्यों नहीं। आप हमारे बुजुर्ग हैं...।''

खिसियाए—से हंसे वैद्य जी, ‘‘सो तो ठीक है, पर काने को काना और बूढ़े को बूढ़ा नहीं कहना चाहिए, समझे कि...जवानी—बुढ़ापा सब दिल का होता है...समझे कि वो कहते हैं न कि ‘साठा सो पाठा'। अब तुम्हें ही देखो, खेलने—खाने की उम्र में ही वीतरागी—सी हो गई हो। समझे कि...अपने को कभी ढंग से संवारकर नहीं देखा तुमने...'' वैद्य जी मुस्कराए और कहा, ‘‘अपने आयुर्वेद में ही ऐसी—ऐसी औषधियां हैं कि बुढ़ापा याद ही न आए।'' कह कर वे अपने मेंहदी रंगे बालों पर हाथ फेरने लगे।

हिमानी के मुंह से कोई बोल नहीं निकला। चुपचाप उठकर रसोई की ओर जाने लगी तो वैद्य जी ने कह दिया, ‘‘चीनी जरा कम डालना, मनी।'' हर बार वैद्य जी यही हिदायत देते। आज उसने खीझ और गुस्से में आकर फीकी चाय ही सामने रख दी। वैद्य जी बिना शिकायत किए मंद—मंद मुस्कराते हुए चाय पी गए। हिमानी ने छेड़ने की गरज से पूछ भी लिया, ‘‘चीनी तो ठीक थी ना वैद्यजी?''

‘‘हां...हां...! बिल्कुल माफिक थी। वो क्या है मनी, तुम्हारे हाथ में ही मिठास है न। समझे कि...जैसे किसी के हाथ में बरकत होती है... ऐसे ही।तुम्हारे ससुर महादेव सिंह कहते थे— मेरी छोटी बहू तो अन्नपूर्णा है। समझे कि कामधेनु है।''

‘‘वैद्य जी, दादी ऊपर बुला रही हैं।'' द्वार पर जेठानी का छोटा लड़का हरकारे—सा बोलकर दौड़ गया तो हिमानी के शरीर पर नाग का बढ़ता कसाव एकदम ढीला पड़ गया। उसे मुक्ति मिली।

पर कैसी मुक्ति? सोच के स्तर पर वह अभी भी उसे दंशित कर रहा था : ‘इतनी कम उम्र, जवानी, औषधि, कामधेनु, रिश्ता' इन सब शब्दों के बीच वह अनावृत्त मृत—सी पड़ी थी। उसके वे शब्द उसे चील—कौवे से नोचते रहे।

किस रिश्ते की बात कर रहा था दयाराम? प्रिंसिपल ने भी रिश्ते का वास्ता दोहराया था। किसके साथ? क्या सचमुच कोई रिश्ता बना है? कुछ बरस साथ काम करने से रिश्ते बन जाते हैं? पर बरसों साथ रहकर रिश्ते चुक भी जाते हैं। कहां हैं उसके रिश्ते? उनकी पकड़ में कौन—कौन हैमां, बाबू जी, रविकांत, नन्नू, रितु या सुखदेव? यह सब चुके हुए रिश्ते हैं। साथ—साथ जी कर भी ये रिश्तों की पैकिंग भर हैं। रिश्ता तो दूर बजते घंटे की ध्वनि से भी बन जाता है, साथ सफर करते मुसाफिर से भी हो जाता है। दूर देश के अजूबों से हो जाता है। अखबारों की सुर्खियों से रिश्ता बन जाता है। इसके लिए साथ—साथ जीने—मरने की जरूरत कहां है?

***

***

Rate & Review

Verified icon

Right 3 days ago

Verified icon

Smita 2 weeks ago

Verified icon

Vivek 3 weeks ago

Verified icon

Geeta 1 month ago

Verified icon

S Nagpal 2 months ago