Part-2 in Hindi Horror Stories by FARHAN KHAN books and stories PDF | खूनी साया Part - 2

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खूनी साया Part - 2


Khooni Saya [ Part - 2 ]

Evil Come From The Darkness


जब मैं घर पहुँचा तो मेरी छोटी बहन [ जीनत ] चुप- चाप एक किताब पढ़ रही थी, मैं धीरे से गया और उसके आँखों को बंद कर चुप चाप खड़ा हो गया, उसने पूछा कौन है फिर मैंने कहा जल्दी पहचान छोटी कौन हूँ मैं ? उसने मुस्कराते
हुए कहा हामिद भाईजान आप आ गए फिर सब लोग कमरे से बाहर निकल आये और मुझे देखने लगे फिर मैने सालाम अर्ज किया, भाभी बोली आप ही का इन्तेज़ार हो रहा था, शाहबजादे बहुत देर कर दी आने में,
फिर मैंंने भाईजान केे न होने पर भाभीजान से पूछा भैया कहाँ हैं तो भाभी बोली बाहर गए हैं एक मीटिंग के सिलसिले में, घर के सभी लोग मेरे घर आने पर बहुत खुश थे, अब्बाजान भी मेरी मौजूदगी से बहुत खुश थे, फिर अम्मी नमाज़ पढ़कर कमरे से बाहर निकली और फिर मैंने सलाम अर्ज़ किया फिर अम्मीजान ने सलाम का जवाब देकर बोली आ गया मेरा लाडला बाहर जाकर कितना बदल सा गया है, बहु! तुम यहाँ खड़ी हो खाना का जल्दी से जल्दी बन्दोबस्त करो अख्तर आता ही होगा फिर मेरी बहन छोटी और सादिया भाभी किचन की ओर चली गयी,
तभी भाईजान भी आ पहुंचे उन्होंने मेरा नाम लेकर पुकारा हामिद मेरे भाई फिर मुझे गले से लगाया ओर कहने लगे अच्छा हुआ तू आ गया, तभी अम्मीजान ने कहा "अल्लाह मेरे दोनों बेटों मे यूँही मोहब्बत क़ायम रखे, तभी भाभीजान किचन से बाहर आयी और कहने लगी खाना तैयार है
सब अपनी अपनी जगह पर बैठ जाइये भाभीजान खाना बहुत अच्छा बनाती थी इसलिए मैंने भाभीजान की तारीफ में कोई कसर नहीं छोड़ी मेरी बहन छोटी बोलने लगी हामिद भाईजान मैंने भी भाभी का साथ दिया है
कुछ मेरा भी हक़ बनता है,
अख्तर भाईजान ने कहा क्यों नहीं छोटी वैसे आप लोगों के लिए बहुत अच्छी खुश खबरी है
हम सब घूमने जा रहे हैँ
इतना सुनते ही मेरी बहन छोटी बहुत खुश हो गयी,
भाईजान ने बताया की उन्हें एक नयी नॉवेल लिखने के लिए कंपनी ने उन्हें एक नया घर गिफ्ट किया है फतेहपुर गाँव में
ये जान कर घर के सभी लोग बहुत खुश हुए,
छोटी ने भाईजान से पूछा "भाईजान हम कब वहाँ जाएंगे"
भाईजान ने कहा "छोटी हमलोग कल ही निकलेंगे"
सब तो बेहद खुश थे मगर सादिया भाभीजान मायूस सी हो गयी फिर अम्मीजान ने कहा क्या हुआ बहु तुम क्यों उदास हो तो भाभीजान ने कहा कुछ नहीं अम्मी बस ये सोच रही थी
इतने दिन से यहाँ रहते रहते इस जगह से मोहब्बत हो गयी है तो भाईजान ने कहा कुछ दिन की तो बात है मेरी नॉवेल पूरी हो जाएगी तो हम फिर यहाँ आ जाएंगे?
मगर भाभीजान की ख़ामोशी को में समझ गया था की वह इस जगह को छोड़ कर जाना नहीं चाहती थी,
अब बस रात कटने का इंतेज़ार था, सभी लोग सो गए
जब सुबह हुई तो सब अपनी तैयारी मे लग गए मैं अम्मी अब्बू का सामान पैक करने लगा तभी सादिया भाभीजान दौड़ी दौड़ी आयी और कहने लगी हामिद ये लो अम्मीजान की दवाइयां भी रख दो फिर मैंने दवाइयां रख कर कहा भाभीजान मेरी कुछ मदद चाहिए? तो भाभीजान ने कहा नहीं हामिद मैं सारे काम कर चुकी हूं बस तुम्हारे भाईजान के कपड़े रखना बाकी हैं
फिर भाभीजान अपने कमरे में चली गयी, मैंने अपनी बहन को देखा तो वह ये सोचने में लगी थी के कौन से कपड़े पहनू फिर मैंने कहा छोटी तू अब तक तैयार नहीं हुई वह कहने लगी भैया देखिये ना मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा मैं कौन से कपड़े पहनू? फिर मैंने कहा "मेरी बहन तो परी जैसी है जो भी कपड़े पहनेगी अच्छी लगेगी" वह हँसने लगी और कहने लगी आप भी मेरा मज़ाक़ उड़ाते हो मैंने कहा ऐसा नहीं है छोटी मेरी बहन सही में प्यारी है,
इतने में ही सादिया भाभीजान आ गयी और कहने लगी हामिद तुम यहाँ हो तुम्हे तुम्हारे भाई ने बुलाया है फिर मैं भाईजान के कमरे में गया तो देखा भाईजान अपने टाइपराइटर पर कुछ काम कर रहे थे ! तब मैंने पूछा भाईजान आपने मुझे बुलाया तो भाईजान ने कहा "हाँ" ये टाइपराइटर गाड़ी मे रखवा दो "आपने काम पूरा कर लिया मैंने पूछा" तो भाईजान ने कहा हाँ हामिद ये लो और इसे गाड़ी में रख दो, फिर मैं बाहर निकल कर आया और गाड़ी के पास पहुँचा डिग्गी उठा कर मैंने वह टाइपराइटर अन्दर रख दिया! मैं फिर वापस घर में आया तो देखा सब तैयार हो चुके थे बस मैंने तैयारी नहीं की थी, तो अम्मीजान ने कहा बेटा अब तक तैयार नहीं हुआ जा जल्दी से तैयार हो जा वरना जानता है ना तेरा भाई कितना जल्दबाज़ है, मैंने कहा मैं उन्ही का काम करके तो आया हुँ मैं जल्दी से तैयार होकर आता हुँ "अम्मीजान" जब मैं कुछ देर के बाद लौटा तो देखा सब बाहर निकल कर गाड़ी में बैठ चुके थे और भाईजान टेलीफ़ोन से किसी से घर में बात कर रहे थे,
तभी मुझे भाईजान ने कहा "हामिद" तुम यँही हो अभी तक फिर मैंने कहा मैं अपनी तैयारी कर रहा था, भाईजान ने कहा तुम बाहर जाकर देखो सब सही से बैठ गए? मैं जल्द से जल्द आता हुँ, फिर मैं घर से बाहर आया तो देखा सब लोग गाड़ी में बैठ चुके थे मुझे देखकर सादिया भाभीजान
ने कहा "हामिद" तुम्हारे भाईजान कहाँ रह गए? मैंने कहा वह टेलीफोन से किसी से बात कर रहे हैं, कुछ देर बाद भैया बाहर निकल कर आये और फिर याक़ूब चाचा को घर का ध्यान रखने के लिए कहने लगे "याक़ूब चाचा" हमारे घर के बगीचे में काम किया करते थे, अब घर की देखभाल करना याक़ूब चाचा के जिम्मे था। फिर भाईजान जब गाड़ी के पास आये तो अम्मीजान कहने लगी अख्तर बेटा क्यों इतनी देरी हो गयी तुम्हे? तो भैया ने कहा हाँ अम्मीजान वह "याक़ूब चाचा" से कुछ बातें कर रहा था।
अब फिर क्या था हमलोग सब गाड़ी में बैठकर रवाना हो गए
अख्तर भाईजान ने कहा फतेहपुर पहुंचने मे तक़रीबन तीन से चार घंटे लग सकते हैं तभी मेरी बहन छोटी कहने लगी भैया बहुत देर हो जाएगी।
भाभीजान ने कहा हाँ रात हो जाएगी पहुँचते पहुँचते तभी भाईजान ने कहा तुम सब घबराओ मत एक रास्ता है कुछ ही दूरी पर एक कच्ची सड़क है हम उस सड़क से जाएंगे तो एक घंटा पहले पहुँच जाएंगे।
तभी अब्बाजान कहने लगे "बेटा अख्तर ये रास्ता दुरुस्त तो है ना? तो भैया कहने लगे हाँ अब्बू आप घबराइए मत मैंने कहा भाईजान वो कच्ची सड़क तक पहुँचने में कितना वक़्त लगेगा तो भैया ने कहा बस आधा घंटा लगेगा।
फिर उस कच्ची सड़क के सहारे हम अपनी मंज़िल तक पहुँचेंगे। रास्ते कटते गए और दिन भी ढलने लगा कुछ देर बाद वह कच्ची सड़क दिखाई देने लगी तभी भैया ने गाड़ी को उस रास्ते पर मोड़ दिया वो रास्ता बहुत ही सुनसान और भयानक सा लग रहा था गाड़ी जैसे जैसे मंज़िल की ओर बढ़ रही थी वैसे वैसे मुश्किलें बढ़ रही थी अचानक कुछ दूर जाते ही एक ढ़ाबा नज़र आया तो भाईजान ने कहा आपलोगों को भूक लगी है कुछ खाने का इंतज़ाम करूँ तो सादिया भाभीजान कहने लगी मगर इस सुनसान जगह पर ढ़ाबा कुछ अजीब नहीं लगा तुम्हे, यहाँ पर दूर दूर तक कोई नज़र नहीं आ रहा है। भाईजान ने हँसते हुए भाभीजान से कहा "तुम भी ना बहुत घबराती हो" ये ढ़ाबा बहुत ही सुनसान जगह पर बना हुआ है इसलिए कोई नहीं दिखाई दे रहा है। तुम चिंता मत करो मैं जल्द वापस आता हुँ। अम्मीजान ने घबराते हुए कहा बेटा अख्तर हामिद को भी साथ लेलो, फिर मैंने भाईजान से कहा, चलिए भाईजान मैं भी साथ चलता हुँ। फिर मैं और भाईजान उस ढ़ाबे की तरफ बढ़ने लगे, जब नज़दीक पहुँचे तो भाईजान ने आवाज़ लगायी "कोई है है लेकिन किसी ने भी जवाब दिया दूसरी बार आवाज़ लगायी तो भी कुछ हरक़त नहीं हुई तब भाईजान ने तीसरी बार आवाज़ लगायी "कोई है क्या" तब एक बूढ़ा आदमी बाहर आया वो हमें बहुत गौर से देख रहा था, फिर भाईजान ने कहा हम फतेहपुर जा रहे थे, रास्ते में मैंने ये ढ़ाबा देखा तो सोचा कुछ खाने को मिल जायेगा। तो वो बूढ़ा आदमी हँसने लगा और कहने लगा आप सही जगह पर आए हो, यहाँ पर मैं और मेरा बेटा रहते हैं वो अभी पानी लाने गया है, बोलिये आप को क्या चाहिए तो भाईजान कहने लगे "चाचा आपके पास जो भी ताजा सामान बना हुआ है वह हमें दे दीजिये, तो वो बूढ़ा इंसान बोलने लगा ठीक है जनाब आप सब बैठिये मैं इंतज़ाम करता हुँ, भाईजान ने कहा हामिद जाओ और सब को ले आओ, फिर मैं भाग कर गाड़ी के पास गया,और सब को गाड़ी से बाहर आने को कहा, फिर सब बाहर आए, और सब उस ढ़ाबे की और बढ़ने लगे, हम पहुँचे तो देखा सबका खाना लगा हुआ है, और भाईजान ने सबसे बैठने के लिए कहा, मेरी बहन जीनत कहने लगी "मुझे बहुत जोर से भूख लगी है शुक्रिया भैया ये बहुत लज़ीज लग रहा है, चलो अब बिना देरी करते हुए खाया जाए" फिर मैंने कहा तू तो सब से बड़ी भुक्कड़ है, तो अम्मीजान कहने लगी बातें ही करोगे खाना भी खाओगे, फिर सब हँसने लगे और हम खाने के लिए बैठ गए, तभी एक लड़का पानी से भरा बाल्टी लेकर आ रहा था उसने बाल्टी रखी और ढ़ाबे के अंदर गया, कुछ ही देर बाद बूढ़ा आदमी अपने बेटे के साथ बाहर आया। तो भाईजान ने उनसे पूछा "चाचा! वैसे हमें फतेहपुर पहुँचने में और कितना वक़्त लगेगा" तो उन्होंने कहा बस एक घंटे का और सफ़र है, ये रास्ता कच्चा है और बहुत मुश्किल से भरा भी, ज़रा संभल कर जाइएगा आपलोग, मौसम भी खराब हो रहा है, जल्द ही बारिश भी हो सकती है,

अख्तर भाईजान : आपका शुक्रिया चाचा दिन भी ढ़लने लगा है, शायद हमें निकलना चाहिए, ये लीजिये चाचा अपने पैसे,
और हाँ आपका खाना लाजवाब था,
बूढ़ा आदमी : शुक्रिया जनाब बस दुआ में याद रखियेगा।

फिर हम अपने सफ़र की ओर चल पड़े कुछ ही दूर जाने के बाद आंधी के साथ बारिश भी शुरू हो गयी। ये सफर बहुत ही मुश्किलों भरा था। पल पल वक़्त हमें इतलाह दे रहा था, खतरों के होने का मगर किस्मत की लिखी इन लकीरों के आगे हम बेबस थे। जब हम फतेहपुर पहुँचे तो भाईजान ने
एक बुज़ुर्ग आदमी से पूछा।

अख्तर भाईजान : ज़रा सुनिए चाचा ये सैयद मंज़िल का पता बताइयेगा?
उस घर का नाम सुनते ही वह थर-थर कांपने लगा तभी उसने कांपते हुए कहा "अरे बेटा मगर तुम वहाँ क्यों जाना चाहते हो वह घर दुरुस्त नहीं है, वहाँ जिन्न का बसेरा है,
ये बात सुनते ही भाईजान हँसने लगे ओर कहने लगे क्या आपने अपनी आँखों से कभी इन चीज़ों को देखा है

बुज़ुर्ग आदमी : नहीं बेटा मगर मैंने लोगों से सुना है,
अख्तर भाईजान : मैं सुनी सुनाई बातों पर यक़ीन नहीं करता।
उस आदमी की बात सुनकर अम्मीजान और सादिया भाभीजान ज़्यादा घबरा गई।
अख्तर भाईजान : वैसे चाचा आप हमें सैयद मंज़िल का पता बताएंगे या नहीं?

बुज़ुर्ग आदमी : बेटा अपनी और अपने परिवार की जान जोखिम मे मत डालो, मेरा कहा मानो वापस लौट जाओ।
भाईजान ने कहा "आपका शुक्रिया हमारा वक़्त बर्बाद करने के लिए, फिर भाईजान ने गाड़ी का शीशा लगाया और आगे बढ़े।
सादिया भाभीजान : उस बूढ़े आदमी की बात कहीं सच ना हो, हमें लौट जाना चाहिए।

अख्तर भाईजान : हम इतनी दूर आये हैं और तुम कह रही हो लौट जाएँ, मुझे जिंदगी में इतना अच्छा मौका मिला है
और मैं कही सुनी बातों को मानकर ये मौका गवा दूँ
तुम फ़िक्र मत करो हम जल्द ही पहुँच जाएँगे।

छोटी (जीनत) : भैया मुझे लगता है सबसे पहले वो जिन्न भाभीजान को पकड़ेगा इसलिए वो इतना घबरा रही है।
छोटी की बात सुनकर सब हँसने लगे।
मगर भाभीजान बहुत फ़िक्र में थी, मैंने कहा भाभीजान आप घबराइये मत कुछ लोगों को नये लोगों का आना पसंद नहीं,
हम पूछते पूछते अपनी मंज़िल तक पहुँच ही गए।
सब गाड़ी से बाहर निकल कर उस घर को देखने लगे, वो घर बहुत बड़ा और शानदार था और गाँव से बहुत दूरी पर था।
यहाँ ख़ामोशी सी छाई हुई थी। चारो ओर घना जंगल और ठहरा हुआ शमा था। घर के सामने एक बड़ा सा बगीचा था जहाँ सिर्फ फूल ही फूल नज़र आ रहे थे, उस घर ने सबका दिल मोह लिया, मगर सादिया भाभीजान अंदर ही अंदर परेशान सी लग रही थी। काश! भाईजान ने उनके एहसास को समझा होता, तो ये मौत का खेल हमारी जिंदगी के साथ शुरू ना होता।