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उर्दू रामायण-नवलसिंह प्रधान
by कृष्ण विहारी लाल पांडेय

नवलसिंह प्रधान कृत उर्दू रामायण बुंदेलखंड के अनेक देशी राज्यों में रहे प्रसिद्ध कवि नवल सिंह प्रधान अथवा नवल सिंह कायस्थ ने अनेक ग्रंथों की रचना की है उर्दू ...

राधारमण वैद्य-भारतीय संस्कृति और बुन्देलखण्ड - 13
by राजनारायण बोहरे
  • 108

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का ‘‘आलोक पर्व ’’ राधारमण वैद्य   परम्परा, लोक और शासन समन्वित संस्कृति विवेचन                 आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी बहु प्रतिभा के धनी थे, उनका ...

हजारी प्रसाद द्विवेदी -मूल्यों का पुनर्पाठ
by कृष्ण विहारी लाल पांडेय
  • 108

हजारी प्रसाद द्विवेदी का साहित्यः मूल्यों का पुनर्पाठ डॉ० के.बी.एल.पाण्डेय साहित्य को व्यापक मानवतावाद और मूल्यवत्ता से जोड़ने वाले तथा मनुष्य को सभी सरोकारों के केन्द्र में रखने वाले ...

अवध किशोर सक्सेना - अनुभव के पैगाम
by राज बोहरे
  • 102

नेतागिरी हो गई, गुंडों की दुकान: बौधगम्य दोहावली समीक्षक-राजनारायण बोहरे अनुभव के पैगाम नामक दोहा संग्रह में 705 दोहे शामिल है। यह संग्रह दतिया के बुजुर्ग कवि अवध किशोर ...

राधारमण वैद्य-भारतीय संस्कृति और बुन्देलखण्ड - 12
by राजनारायण बोहरे
  • 105

शक्ति के प्रतीक हनुमान: ’हनुमान बाहुक’ पर एक दृष्टि राधारमण वैद्य                मनीषियों का ऐसा मत है कि नाम-रूप से व्यक्त सभी पदार्थो में शक्ति तत्व धर्म, और गुण ...

बुंदेलखंड का सैर साहित्य
by कृष्ण विहारी लाल पांडेय
  • 135

बुंदेलखंड में परिनिष्ठित साहित्य रचना के साथ ही लोक साहित्य की भी समृद्ध परंपरा रही है। साहित्य के यह दोनों रूप यहां समानांतर की स्थिति में ही सहवर्ती नहीं ...

अब सब कुछ - चम्पा वेद
by राज बोहरे
  • 156

चम्पा वेद का काव्य संग्रह ‘अब सब कुछ‘   पुस्तक समीक्षा- अब सब कुछ: ताजगी भरी कविताऐं। राजनारायण बोहरे चम्पा वेद का नाम कुछ बरस  तक अंजाना सा था, ...

राधारमण वैद्य-भारतीय संस्कृति और बुन्देलखण्ड - 11
by राजनारायण बोहरे
  • 123

तुलसी के ’’मानस’’ की पृष्ठभूमि राधारमण वैद्य                कलियुग के बाल्मीकि, मुगल काल का सबसे महान् व्यक्ति, बुद्धदेव के बाद सबसे बड़ा लोकनायक, सर्वतोमुखी ’’प्रतिभा’’ तथा निरन्तर विषपान करके ...

गूंगा गांव - रामगोपाल भावुक
by राज बोहरे
  • 282

  भारत के हर गांव की कथा है गूंगा गांव ।    पुस्तक समीक्षा पुस्तक का नाम उपन्यास गूंगा गांव लेखक रामगोपाल भावुक  प्रकाशक ममता प्रकाशन दिल्ली  मूल्य ₹125 ...

राधारमण वैद्य-भारतीय संस्कृति और बुन्देलखण्ड - 10
by राजनारायण बोहरे
  • 153

केशव का युग और शाक्त मत राधारमण वैद्य                               भारतीय वाङमय में सम्प्रदाय का पोषण और साम्प्रदायिक परम्पराओं का खण्डन-मण्डन खूब हुआ है पर उसे उच्च साहित्य का लेबिल ...

रत्नावली - भावुक
by राज बोहरे
  • 336

यह उपन्यास तुलसीदास जी की पतनी रत्नावली के अल्पज्ञात जीवन और व्यक्तित्व पर केद्रित उपन्यास है। लेखक कल्पना सूझ बुझ के धनी है। साहित्य इतिहास में मौजूद कुछ नाम ...

राधारमण वैद्य-भारतीय संस्कृति और बुन्देलखण्ड - 9
by राजनारायण बोहरे
  • 192

समय और समाज सापेक्ष रीतिकाल राधारमण वैद्य                किसी रचनाकाल के साहित्य-विवेचन में उस काल-खण्ड की दृष्टियों, शैलियों, तत्कालीन-सामाजिक रूचियों, आर्थिक दशा और राजनीतिक घात-प्रतिघात का पता चलता है। ...

कारवां ग़ुलाम रूहों का - अनमोल दुबे
by राजीव तनेजा
  • 249

आज के टेंशन या अवसाद से भरे समय में भी पुरानी बातों को याद कर चेहरा खिल उठता है। अगर किसी फ़िल्म या किताब में हम आज भी कॉलेज ...

अनिल करमेले - बाकी बचे कुछ लोग
by राज बोहरे
  • 300

अनिल करमेले बाकी बचे कुछ लोग अनिल कर मेले का दूसरा कविता संग्रह बाकी बचे कुछ लोग लगभग 20 वर्ष के अंतराल बाद सेतु प्रकाशन से आया है। अनिल ...

राधारमण वैद्य-भारतीय संस्कृति और बुन्देलखण्ड - 8
by राजनारायण बोहरे
  • 213

ऐतिहासिक एवं भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में सनकादि सम्प्रदाय राधारमण वैद्य                                 मध्यप्रदेश, जिसकी सीमा मनुस्मृति के अनुसार विनशन (सरस्वती) के पूर्व प्रयाग से पश्चिम, हिमालय से दक्षिण और विन्ध्याचल ...

राधारमण वैद्य-भारतीय संस्कृति और बुन्देलखण्ड - 7
by राजनारायण बोहरे
  • 237

सनकादि सम्प्रदाय, सनकुआ और सेंवढ़ा                  स्थान-नाम, भाषा की जीवन्त शब्दावली है, जो घिस-मँजकर रूपान्तरित होते हुए शताब्दियों तक अपना मूल्य स्थिर रखते हैं और जन-आस्थाओं के आधार ...

हरे स्कर्ट वाले पेड़ों के तले- नीलम कुलश्रेष्ठ
by राजीव तनेजा
  • 303

कहते हैं कि मनुष्य की कल्पना का कोई ओर छोर नहीं है। इसमें अपार संभावनाएं मौजूद होती हैं कुछ भी..कहीं भी..कैसा भी सोचने के लिए। मनुष्य अपनी कल्पना से ...

बारह मास वसन्त - लक्ष्मीनारायण बुंनकर
by राज बोहरे
  • 237

बारह मास वसन्त-लक्ष्मीनारायण बुंनकरबारह मास वसंत कवि लक्ष्मी नारायण बुनकर का पहला कविता संग्रह है, जो ग्रंथ भारती दिल्ली ने छापा है । संग्रह में कवि की विभिन्न प्रकार ...

राधारमण वैद्य-भारतीय संस्कृति और बुन्देलखण्ड - 6
by राजनारायण बोहरे
  • 294

‘‘ बुन्देलखण्ड की प्राचीन मूर्ति व वास्तु कला ’’                भारत के केन्द्रीय प्रदेश बुन्देलखण्ड की ‘‘कीरत के विरवा’’ की जडं़ अति प्राचीन है। भौगोलिक दृष्टि से इस क्षेत्र ...

ये आम रास्ता नहीं- रजनी गुप्त
by राजीव तनेजा
  • 345

आम रोज़मर्रा के जीवन से ले कर कला तक के हर क्षेत्र में हम सभी अपने मन में उमड़ते घुमड़ते विचारों को बाहर लाने के लिए अपनी रुचि एवं ...

पवन करण - कोट के बाजू में बटन
by राज बोहरे
  • 315

पवन करण-कोट के बाजू में बटन स्त्री मेरे भीतर संग्रह से ख्याति प्राप्त हुए कवि पवन करण के कविता संग्रह "कोट के बाजू में बटन "(राधाकृष्ण प्रकाशन) में कुल ...

राधारमण वैद्य-भारतीय संस्कृति और बुन्देलखण्ड - 5
by राजनारायण बोहरे
  • 357

उत्तरी मध्यप्रदेश का गौरवशाली स्थल-                       ‘‘ इतिहास का भूला’-बिसरा पृष्ठ ‘‘भर्रोली ’’ राधारमण वैद्य                अभी हर स्थान अपने इतिहास के लिखे जाने की प्रतीक्षा में है, विशेष ...

अमेय कान्त - समुद्र से लौटेंगे रेत के घर
by राज बोहरे
  • 300

अमेय कान्त का कविता संग्रह अमेय कान्त उस पीढ़ी के कवि हैं जो पूरे आत्मविश्वास, शिल्प की साधना और सुदीर्घ अध्ययन के बाद कविता संसार में दाखिल हो रहे ...

राधारमण वैद्य-भारतीय संस्कृति और बुन्देलखण्ड - 4
by राजनारायण बोहरे
  • 423

ग्राम अभिधान और  ’’पुरातत्व’’ राधारमण वैद्य                भाषा-विज्ञान और पुरातत्व पारस्परिक सहयोगी हैं। केवल ग्राम नामावली और यत्र-तत्र बिखरी पुरा-सामग्री का सम्बन्ध और उसकी संगति पर विचार करना है। ...

श्यामसुंदर तिवारी - मैं किन सपनों की बात करूं
by राज बोहरे
  • 483

श्यामसुंदर तिवारी एक तपे हुए गीतकार हैं , जिनके पास नवल बिंब ,नवल कथ्य और नवल भाषा है। श्याम तिवारी जी का नवगीत संग्रह "मैं किन सपनों की बात ...

राधारमण वैद्य-भारतीय संस्कृति और बुन्देलखण्ड - 3
by राजनारायण बोहरे
  • 396

हिन्दी की गोद में तमिल-पुत्री ‘‘बरगुण्डी’ राधारमण वैद्य’                कुछ वर्ष पूर्व श्री अमृत पय्यर मुत्तू स्वामी, ( जो इस लेख को लिखने के समय दतिया शासकीय स्नातक महाविद्यालय ...

निठल्लें - रेखा सक्सेना वासुदेव
by राज बोहरे
  • 345

  निठल्लें प्रयोगवादी नाटक रेखा सक्सेना वासुदेव नया रचने की मशक्कतः निठल्लें समीक्षक- राजनारायण बोहरे   ”निठल्ले” एक प्रयोगवादी नाटक हैं, जो रेखा सक्सेना वासुदेव ने वर्तमान युग की ...

स्वतन्त्र सक्सैना के विचार - 3  
by बेदराम प्रजापति "मनमस्त"
  • 345

         साहित्‍य की जनवादी धारा                                                                                             डॉ0  स्‍वतंत्र कुमार सक्‍सेना साहित्‍य के पाठक एवं रचनाकार सुधी जन सबके मन में यह प्रश्‍न उठता है । साहित्‍य में जनवादी कौन ...

राधारमण वैद्य-भारतीय संस्कृति और बुन्देलखण्ड - 2
by राजनारायण बोहरे
  • 357

बाणकालीन पाराशरी भिक्षु राधारमण वैद्य                                                             जब कभी नाम रूप से एक समान दिखने वाला व्यक्ति, समुदाय या समाज के भीतर से अपने आचार-विचार में भिन्न होता है ...

ताश के पत्ते- सोहेल रज़ा
by राजीव तनेजा
  • 375

कहते हैं कि हर इंसान की कोई ना कोई..बेशक कम या ज़्यादा मगर कीमत होती ही है।कौन..कब..किसके..किस काम आ जाए..कह नहीं सकते। ठीक उसी तरह जिस तरह ताश की ...