हमदम मेरे राही

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सुबह के लगभग 8 बज रहे थे।दिल्ली जैसे बड़े शहर में जो कभी न रुकना वाले शहर के नाम से जाना जाता है।सड़क पर लोगों के कदमों की आवाज और गाड़ियों की रफ्तार की आवाज गूंज रही थी।सूरज अपने पूरे शबाब से हर जगह अपने किरणें फैला रहा था।कोई अपने घर में बच्चों को स्कूल भेजने के लिए तैयार कर रहा था तो कोई अपने ऑफिस, कॉलेज, दफ्तर,और अपने अपने काम पर जाने को तैयार  हो रहा था।इन ही शोर-शराबे की शहर दिल्ली के वसंत कुंज जहां की शांति दिल्ली की भागदौड़ से अलग है, में एक मकान स्थित था।वो