पुराना जहाज़

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पुराना जहाज़*************वह खाँसता हुआ, साँसों को जैसे खींचता हुआ नदी के किनारे यहाँ वहाँ घूमता रहता। उछलते हुए पानी की मस्तियाँ, नज़दीकी गाँव की हरियाली और आसमान के बदलते रँगों को घँटों निहारता रहता। किनारे पर लगाया गया वह पुराना, बिना काम का जहाज़ उसका पक्का साथी था।"गोविंद भाऊ, काय झाल? इकडे काय शोधून राहता?" कभी कोई ऐसा पूछ लेता, तभी वह रूखे सूखे होठों पर छोटी सी मुस्कान ले आता और अपने दिल पर  ज़ुर्रियों वाले दोनों हाथ रख लेता।  पूरे दिन में एकबार वह पूरे जहाज़ को न देखे तो उसका दिन मानों बेकार सा लगता। कभी कभार उसके