मंदिर में तुम - 3

सुबह का वही मंदिर…वही सीढ़ियाँ… वही घंटियों की आवाज़…पर आज…कृतिक के चेहरे पर कुछ अलग था…सुनामी पहले से वहाँ खड़ी थी…जैसे उसे उसका इंतज़ार हो…जैसे ही कृतिक आया…उसने मुस्कुराने की कोशिश की…पर आज उसकी मुस्कान… अधूरी थी…दोनों मंदिर के पीछे उसी पीपल के पेड़ के पास बैठ गए… कुछ पल…कोई कुछ नहीं बोला…फिर…कृतिक (धीरे, गंभीर आवाज़ में) बोला - मुझे… कुछ महीनों के लिए मुंबई जाना पड़ रहा है…सुनामी का दिल जैसे एकदम रुक गया…सुनामी (धीरे से) बोली - मुंबई…? क्यों…?कृतिक बोला - एक case है…थोड़ा बड़ा… और risky भी…उसकी आँखों में वही निडरता थी…पर इस बार… उसके पीछे छुपा खतरा भी साफ