अब इंतज़ार… डर में बदल चुका था…कई दिन बीत गए…ना कोई कॉल… ना कोई मैसेज…सुनामी टूटने लगी थी…एक रात…उसने अचानक फैसला लिया…वो बोली - मैं खुद जाऊँगी… मुंबई…उसके दिल में डर था…पर उससे कहीं ज्यादा…कृतिक को खो देने का खौफ…।अगले ही दिन…वो मुंबई के लिए निकल गई, भीड़… शोर… भागती हुई ज़िंदगी…सब कुछ नया था उसके लिए…पर उसकी आँखें सिर्फ एक ही चेहरा ढूंढ रही थीं—कृतिक…काफी पूछताछ के बाद…उसे वो गेस्ट हाउस मिल गया…जहाँ कृतिक ठहरा था…उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था…वो धीरे-धीरे अंदर गई…रिसेप्शन पर जाकर नाम बताया…।वो बोली - कृतिक ठाकुर…रिसेप्शनिस्ट ने उसे देखा…थोड़ा सोचा…फिर बोला—वो कई दिनों से