मंदिर में तुम - 5

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रात गहरा चुकी थी… मुंबई की भागती हुई एमएम धीरे-धीरे पीछे छूट रही थी…कृतिक और सुनामी…दोनों स्टेशन पर खड़े थे…अब लौटने का वक्त था…अपनी पुरानी जगह… नोएडा…और… अपने मंदिर के पास…ट्रेन आ चुकी थी… दोनों चुपचाप अपनी सीट पर बैठ गए…कुछ पल…बस खिड़की के बाहर देखते रहे…फिर…ट्रेन चल पड़ी, हल्का-सा झटका लगा…और उसी के साथ…जैसे उनकी ज़िंदगी भी एक नए सफर पर निकल पड़ी…सुनामी ने धीरे से अपनी कलाई उठाई…कश्मीरी चूड़ियाँ…हल्की-हल्की खनक रही थीं… कृतिक की नजर उन पर पड़ी…वो हल्का सा मुस्कुरा दिया…।कृतिक (धीरे से)। बोला - अच्छी लग रही हैं…सुनामी (शरमाते हुए) बोली - किस पर…?कृतिक (नज़रें उसी