“क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।” –(श्रीमद्भगवद गीता - अध्याय 2, श्लोक 63)अक्सर लोग क्रोध को केवल एक क्षणिक भावना (Emotion) मानते हैं, लेकिन श्रीकृष्ण इस श्लोक में क्रोध के उस खतरनाक वैज्ञानिक चक्र को समझा रहे हैं जो पल भर में इंसान का पूरा जीवन बर्बाद कर सकता है।श्रीकृष्ण कहते हैं कि क्रोध से मनुष्य की बुद्धि में संमोह (मूढ़ता या अंधकार) पैदा होता है। बुद्धि में अंधकार छाने से उसकी स्मृति (याददाश्त और सही-गलत की समझ) भ्रमित हो जाती है। स्मृति भ्रमित होने से मनुष्य की बुद्धि का नाश हो जाता है। और जिस मनुष्य की बुद्धि का नाश