अमृत वाणी - संत वाणी - 9

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“वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीर पराई जाणे रे।पर दुःखे उपकार करे तोये मन अभिमान न आणे रे।।”गहरे अर्थ की व्याख्यानरसी मेहता जी इस भजन में कहते हैं कि ईश्वर का सच्चा भक्त या धार्मिक इंसान (वैष्णव) केवल वही है जो ‘पीर पराई जाणे’ अर्थात दूसरों के दुःख, दर्द और पीड़ा को अपनी पीड़ा समझता है, वह दुखी और असहाय लोगों की मदद करता है, और सबसे महत्वपूर्ण बात—दूसरों पर उपकार या उनकी मदद करने के बाद भी उसके मन में रत्ती भर भी घमंड (अभिमान) नहीं आता कि “मैंने किसी की मदद की है।”व्यावहारिक उदाहरणइसे आप चिकित्सा या