इस बार उसने उसे खोला।हाथ काँप रहे थे,दिल भी।पत्र लंबा नहीं था।लेकिन हर पंक्ति जैसे किसी और समय से आई हुई लगती थी।"समर,अगर तुम यह पत्र पढ़ रहे हो तो इसका अर्थ है कि मैं वहाँ नहीं हूँ जहाँ तुम मुझे खोजते थे।"समर की साँस अटक गई।वह पढ़ता गया।"मैं चाहती थी कि यह पत्र कभी न पढ़ा जाए।लेकिन जीवन हमारी इच्छाओं से अधिक अपने निर्णयों पर चलता है।"कुछ क्षण तक शब्द धुँधले हो गए।फिर उसने आगे पढ़ा।"सबसे पहले एक बात।अपने जीवन को मेरे शोक में मत बदल देना।"समर हँस पड़ा।एक टूटी हुई, भीगी हुई हँसी।क्योंकि वह जानता था,कुछ बातें इतनी