पंछी का पिंजरा

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हमारे घर से कुछ ही दूरी पर रेल की कुछेक पटरियां थीं और जिन पर ना जाने कौन कौन सी कितनी ट्रेनें हर वक्त बेवक्त गुजरती रहती थीं। सुबह सबेरे और आधी रात के वक्त के गुजरने के बाद ही वहाँ पर से गुजरती उन चंद एक ट्रेनों की पुरज़ोर हुंकारें और ताबड़तोड़ आवाज करते पूरी रफ़्तार से सरपट दौड़ते पहियें का कर्ण भेदी संगीत बड़ा परेशान करते थे। उन घड़ियों में ही नींद का जोर होता था और उन ट्रेनों की वजह से नींद उचट जाती थी और एक बार निद्रा भंग होने के पश्चात् फिर से सो पाना नामुमकिन सा ही होता। और जब मैं भी अनायास ही कोई कोई ट्रेन की आवाज सुनकर नींद से उठ खड़ी होती, तो मेरे बाबूजी मुझे दोवारा सुला देते। मेरे सिर पर हल्के हाथों की हल्की हल्की थपकियाँ देकर।

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पंछी का पिंजरा - भाग 1

हमारे घर से कुछ ही दूरी पर रेल की कुछेक पटरियां थीं और जिन पर ना जाने कौन कौन कितनी ट्रेनें हर वक्त बेवक्त गुजरती रहती थीं। सुबह सबेरे और आधी रात के वक्त के गुजरने के बाद ही वहाँ पर से गुजरती उन चंद एक ट्रेनों की पुरज़ोर हुंकारें और ताबड़तोड़ आवाज करते पूरी रफ़्तार से सरपट दौड़ते पहियों का कर्ण भेदी संगीत जी को बड़ा परेशान करते थे। उन घड़ियों में ही नींद का जोर होता था और उन ट्रेनों की वजह से नींद उचट जाती थी और एक बार निद्रा भंग होने के पश्चात् फिर से सो पाना ...Read More

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पंछी का पिंजरा - भाग 2

मारे घर की बड़ी सी खिड़की से तकरीबन एक नन्हें से बच्चे के नन्हें नन्हें दस बारह हाथ की दूरी पर लगे हुए आम्रवृक्ष की ऊर्ध्वाधर तन्वंगी शाखा पर बने छोटे से नीड़ में पल रहे दो पंछियों के नन्हें नन्हें बच्चे वक्त के बढ़ते कदमों की तरह अपने पंख लगा कर ना जानेकब के उड़ चुके थे और उस दीर्घकालिक थकान और उड़ान भरने के साथ ही ही मैं भी पहले से कुछ और बड़ी हो गई थी। उस वर्ष मैं बारह वर्ष की हो चुकी थी। लेकिन अभी तक भी मुझे मेरे बचपन ने छोड़ने के लिए ...Read More

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पंछी का पिंजरा - भाग 3

दारुण बिलाव के सम्मुख जैसे कि निरीह कपोत स्वयं को असहाय सा अनुभव करता है,ठीक वैसे ही उस समय दशा थी। मेरी हिम्मत मेरे भीतर ही भीतर दम तोड़ती हुई महसूस हो रही थी।मैं लाख चाहने पर भी वहाँ पर से अपनी जान बचा कर कैसे भागती? पथ को पूर्णतया अवरुद्ध करके दादी रूपा सिंहनी जो आगे डटी खड़ी थी। अडिग और नृशंस!हम दोनों एक दूसरे के आमने सामने खड़े थे और ना तो दादी ने अपनी तरफ से कोई पहल की और मैने भी पहल करने के औचित्य पर चित्त बना कर मनन कर लिया था।उस तरह निस्तब्धता ...Read More

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पंछी का पिंजरा - भाग 4

मुझे दो दिन बाद होश आया था। डाक्टर नर्सस और जान पहचान के सभी लोगों ने मेरी बचने की पूरी तरह से खो दी थी। जैसे कि बीच नदी के पहुँचते ही भंवर उठने पर मल्लाहें सभी तरह की आशाओं को छोड़कर निराशाओं के भंवर में फंस जाते हैं। और दूसरी बारजोरदार तूफानी लहरों के उठने से पहले ही संभवतः सब कुछ समाप्त सा लगने लगता है।अम्मा बाबूजी का भी यही सब हाल था। सभी ने मेरे लिए दो चार आंसू बहाने मे कोई कसर नहीं छोड़ी होगी। लेकिन किसी को क्या पता था कि मैं भी फिनिक्स पंछी ...Read More