पंछी का पिंजरा - भाग 1 in Hindi Women Focused by Anil Kundal books and stories PDF | पंछी का पिंजरा - भाग 1

Featured Books
Categories
Share

पंछी का पिंजरा - भाग 1

हमारे घर से कुछ ही दूरी पर रेल की  कुछेक पटरियां थीं और जिन पर ना जाने कौन कौन सी  कितनी ट्रेनें हर वक्त बेवक्त गुजरती रहती  थीं। सुबह सबेरे और आधी रात के वक्त के गुजरने के बाद ही वहाँ पर से गुजरती उन चंद एक ट्रेनों की पुरज़ोर हुंकारें और ताबड़तोड़ आवाज करते पूरी रफ़्तार से सरपट दौड़ते पहियें का कर्ण भेदी संगीत बड़ा परेशान करते थे। उन घड़ियों में ही नींद का जोर होता था और उन ट्रेनों की वजह से नींद उचट जाती थी और एक बार निद्रा भंग होने के पश्चात् फिर से सो पाना नामुमकिन सा ही होता। 

और जब मैं भी अनायास ही कोई कोई ट्रेन की आवाज सुनकर नींद से उठ खड़ी होती, तो मेरे बाबूजी मुझे दोवारा सुला देते। मेरे सिर पर हल्के हाथों की हल्की हल्की थपकियाँ देकर। 

हम दो बहनों के अतिरिक्त और कोई औलाद नहीं थी मेरे माँ बाबूजी की। मैं अभी बमुश्किल सात बरस को होने को आई थी और मेरी छोटी बहन गुड्डी मुश्किल से अभी खींच तान कर दो बरसों से ज्यादा की नहीं रही होगी। 

हमारी दादी को हम दोनों बहनें ज़हर की पुड़ियों से कम नहीं लगती थी और संभवतः माँ को भी हम दोनों पसंद नहीं थीं। क्योंकि वो भी पहली संतान एक बेटा ही चाहती थी। और दुर्भाग्यवश हो गई मैं। वो भी एक लड़की! तो ज्यादातर मैं ही उन दोनों के कोप का भाजन बनती। कभी कभार छुटकी भी उनके हत्थे चढ़ जाती थी। पर ऐसा होना बारम्बार ना होता। शायद इसलिए भी कि वो अभी बहुत ही नन्हीं बालिका थी। 

बाबूजी बहुत व्यावहारिक व्यक्ति थे और लड़की लड़के में कोई फर्क नहीं करते थे। उनके उस स्वच्छंद और आदर्शपूर्ण सोच ने कभी भी हमें लड़कियों के जैसे नहीं पाला पोसा, बल्कि हमें लड़कों जैसी स्वतंत्रता और सोच दी ताकि हम दोनों उस बर्बर समाज का शिकार नहीं बनें। 

एक रात यही कोई तकरीबन दो ढाई के बीच के वक्त एकाएक से मेरी सुखद निद्रा उचट गई और मैं रो रो कर जिद्दी रट्टू तोते की तरह बस एक बात की जिद्द को बारम्बार दोहराती रही, " मुझे बाबूजी की साईकिल पर झूटे लेने हैं! "

बाबूजी तिसपर बहुतेरा समझाने का यत्न किया कि बच्चे, सुबह होने दे - फिर ढेर सारे झूटे मिलेंगे। अभी बहुत रात की बेला जो है। पुलिस अंकल, हमें चोर उचक्के समझकर पकड़ कर जेल ले जाएंगे और फिर  ठैं ठैं ठैं जूतों की मार खानी पड़ेगी। उस दिन पिक्चर में आपने देखा था ना? चोरों को कैसे मार पड़ती है! 

" हाँ, देखा था, बाबूजी! " मैंने तुरंत से अपना रोना धोना बंद किया और फिर फिर से एक और नई जिद्द छेड़ दी, " हमें पिक्चर देखना है! वो ही चोर पुलिस वाली! टीवी लगाओ! "

बाबूजी थोड़े से परेशान हो गए थे और शायद उस वक्त उन्हें नींद भी जोरों की आई हुई थी। उनकी जगह अगर कोई और रहा होता, तो गुस्से में भरकर खींच खींच कर दो चार रैपटे रसीद कर देता। लेकिन उन्होंने फिर से बड़े ही लाड दुलार से कहा, " हम लोग अगर इतनी रात को टीवी लगाएंगे, तो आपकी दादीजी उठ जाएंगी। और वो यदि अपनी नींद से उठी तो हम दोनों की खैर नहीं। और फिर वो ही पुलिस अंकल वाला मार कटापा शुरू समझो! "

वो मार वाली बात सुनकर मैं बहुत भय खा गई और उन्हें टीवी चलाने की तुरंत मनाही दे दी। 

मुझे कुछ देर अपनी गोद में उठाकर बाबूजी ना जाने कब तक अपने कमरे के अंदर ही चहलकदमी करते रहे। 

मैं सो चुकी थी और नींद में बारमबार मुस्कुरा रही थी।