panchhi ka pinjra part 3 in Hindi Women Focused by Anil Kundal books and stories PDF | पंछी का पिंजरा - भाग 3

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पंछी का पिंजरा - भाग 3

दारुण बिलाव के सम्मुख जैसे कि निरीह कपोत स्वयं को  असहाय सा अनुभव करता है,ठीक वैसे ही उस समय मेरी दशा थी। मेरी हिम्मत मेरे भीतर ही भीतर दम तोड़ती हुई महसूस हो रही थी। 

मैं लाख चाहने पर भी वहाँ पर से अपनी जान बचा कर कैसे भागती? पथ को पूर्णतया अवरुद्ध करके दादी रूपा सिंहनी जो आगे डटी खड़ी थी। अडिग और नृशंस! 

हम दोनों एक दूसरे के आमने सामने खड़े थे और ना तो दादी ने अपनी तरफ से कोई पहल की और मैने भी पहल करने के औचित्य पर चित्त बना कर मनन कर लिया था। 

उस तरह निस्तब्धता की घड़ियाँ पलक झपकाए ही बीत गईं और मैने ही ख़ामोशी छोड़कर हठात कहा, " दादी जी! वो... वो... गुड्डी के कहने पर... लेकिन अब से आगे ऐसा वैसा कुछ नहीं करूँगी! कान पकड़कर क्षमा मांगती हूँ। इस बार.... जाने दीजिए... मुझसे गलती हो गई। ठीक है.... मेरी अच्छी दादी जी! तो मैं चलूँ? " मैंने उखड़ते हुए शब्दों की सांसों को उम्मीद का सहारा देकर कहा और त्वरित से जाने को उद्यत हुई। 

कि एकाएक से मेरे बिखरे हुए बालों को अपने दोनों हाथों की मजबूत पकड़ में जकड़ कर उन्होंने ने एक जोर से झटका दिया और और बालों के साथ मैं भी चीखती बिलखती अनायास ही अंगड़ खंगड़ जीर्ण शीर्ण जर्जर महल के जैसे उसी ओर खिंची चली आई।

" अई...  आह! .... दादी जी..... बालों को छोड़ दीजिए, बहुत दुखता है! " मैं बेचारी  उस  किसी हिरनी के जैसे तड़पी जिसकी ग्रीवा किसी निर्मम सिंहनी के जबड़ों के बीच फंसी हों।  पर उस कठोर हृदया सिंहनी के जैसे ही मेरी दादी जी कहाँ पसीजने वाली थीं। उस कृत्य से उन्हें आंतरिक सुख की अनुभूति हो रही थी। 

बीच बीच में अपने रहे सहे बचे खुचे दांतों को भींच भींच कर वो गुस्से के साथ गरजते हुए कहती जाती थी, " और करेगी अब से ऐसा? कहा था, अनगिनत बार कहा था, तुझसे। कि मुझे यह सब कुछ बिलकुल भी पसंद नहीं है। पर तू मानने को तैयार थी क्या? नहीं ना? मेरे तो इस बड़े बेटे, विश्वेश्वर सिंह, के तो मानों कर्म ही फूट गएं हों! बेचारे के घर दो दो औलादें हुईं और वो भी निगोड़ी बेटियां! हमें नहीं जरूरत थी इन कलमुँहियों की! और आज तू मेरे ठीक ठिकाने से हत्थे चढ़ी है। सोचती हूँ कि तुझे तो ठिकाने ही लगा दूं। कुछ दिन बेचारा विश्वेश्वर रो लेगा और हम भी दो चार टसुएं उसके साथ साथ बहा ही लेंगे। "

 जितनी तीव्रतम स्वर मेरी चीत्कारें पकड़तीं, उतने ही हंसी की फब्तियाँ उनके खिले हुए मुख को और भी खिला रहीं थीं। मुझे उस वक्त ऐसा लगा मानों उस उत्पीड़ित और उत्पीड़क के मनचीते खेल में दादी जी आनन्दित भाव से अपनी अनिंद्य भागेदारी निभा रहीं हों। 

और उद्भावना लगाई उस असह्य पीड़ा की जब कोई आपके बालों को अपनी मुट्ठियों में भींच कर खींचता है, तो कितने वेदनाकुल हो उठते होंगे आप! ठीक वैसे ही मैं भी बेइंतहा दर्द से कुलबुला रही थी। मेरी आँखों के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। और मैं रोती हुई उस साड़ी के पल्लू से अपने आंसुओं को बारम्बार पोंछती जा रही थी। 

मुझे अपनी सहनशक्ति पर आश्चर्य हो रहा था कि उस असह्य पीड़ा में भी मैं अपने बच निकलने का उपाय सोच सकती थी। अचानक से ही मेरा रोना धोना ऐसे बंद हो गया जैसे कि किसी बड़े से उपन्यास की समाप्ति होती है और पीछे बचे रह जाते हैं वो ही दो तीन सफाचट श्वेत पन्ने!  संभवतः दादी को भी ऐसी विलक्षण अनुभूति का बोध हुआ होगा। परंतु वो कुछ भी बोली नहीं। 

मेरे आंसुओं की बाढ़ भी पूरी तरह से थम चुकी थी। मैं किंचित मुस्कुराई और मेरा मुख सुंदर सलोनी परी सा फैल सा गया था। 

गली में अब भी भीड़ भडक्का था और घर से कुछ ही दूरी पर पटरियों पर दो ट्रेनें आ और जा रहीं थीं। उनके इंजन की आवाज़ें और सीटियों के शोर ने सब कुछ अपनी सीमा के भीतर ले लिया था। 

ताबड़तोड़ चलते पहियों की आवाज दिल की धड़कन को और भी बढ़ा रही थी। ऐसा लगता था कि दिल अब फटा तब फटा। 

उस बीच दादी के हाथों की पकड़ मेरे बालों पर कुछ शिथिल पड़ गई थी और उस बात का अहसास मुझे खूब अच्छे से हो गया था। 

अभी भी वो दो रेल गाड़ियों के आने जाने का सिलसिला जारी था। और उस सुअवसर को हाथों से जाने देना, सरासर बेवकूफ़ी नहीं, तो क्या होता? 

मैंने अपनी दोनों हाथों की अंगुलियों को शीघ्रातिशीघ्र उनकी उंगलियों में कसा और एक ही पुरज़ोर झटके के साथ ही अपने बालों को उनकी कैद से रिहा करा लिया। 

उसका प्रभाव दादी पर ऐसा प्रतिकूल हुआ कि वो चारों खाने चित हो चुकी थी। और हतप्रभ भाव से वो सिर्फ मुझे देखती ही रह गईं। 

और मैं अपलक वहाँ से भाग खड़ी हुई। और उस समय वो दोनों ट्रेनें अपने अपने गंतव्य स्थलों की ओर निकल गईं थीं। 

अभी बमुश्किल से मैं अपने घर की ड्योढ़ी भी पार नहीं कर सकी थी कि धम्म से मेरे सिर के पिछले हिस्से से कोई भारी भरकम वस्तु आ लगी और उसके लगने के साथ ही मैं कटी पतंग की तरह चक्कर खाती हुई कठोर धरा पर लुढ़क गई। 

मेरे सिर से पानी के फव्वारे की तरह गरम गरम लहू बहने लगा।