“शिफ़ा शिफ़ा....”,अनस सहन में खड़ा उसको आवाज़ कम दे रहा था और चि़ल्ला ज़्यादा रहा था।“क्या मुसीबत है, कभी तो चैन से खाना खाने दिया करो। हर वक़्त सर पर नाज़िल रहते हो”वह बड़बड़ाती हुई कमरे से बाहर निकली थी।“हर वक़्त खाती ही रहती हो फट जाओगी एक दिन!!!”उसने उस की नागवारी को खातिर में ना लाते हुए कहा।“बेफिक्र रहो तुम्हारे पास नही आउंगी सिलवाने ,यह बताओ किस काम से आए थे? काम करो और फूटो यहां से!!!!”,उसे पता था कि अनस को उससे कभी कोई काम नही होता। उसका मक़सद सिर्फ शिफ़ा को तंग करना होता है।
Muhabbat Ek Sabaq - 1
“शिफ़ा शिफ़ा....”,अनस सहन में खड़ा उसको आवाज़ कम दे रहा था और चि़ल्ला ज़्यादा रहा था।“क्या मुसीबत है, कभी चैन से खाना खाने दिया करो। हर वक़्त सर पर नाज़िल रहते हो”वह बड़बड़ाती हुई कमरे से बाहर निकली थी।“हर वक़्त खाती ही रहती हो फट जाओगी एक दिन!!!”उसने उस की नागवारी को खातिर में ना लाते हुए कहा।“बेफिक्र रहो तुम्हारे पास नही आउंगी सिलवाने ,यह बताओ किस काम से आए थे? काम करो और फूटो यहां से!!!!”,उसे पता था कि अनस को उससे कभी कोई काम नही होता। उसका मक़सद सिर्फ शिफ़ा को तंग करना होता है।“काम तो मैं ...Read More
Muhabbat Ek Sabaq - 2
अहमद मन्ज़िल शफीक़ अहमद की मल्कियत थी। पुरानी लेकिन बेहद आलीशान हवेली, जिसके बड़े-बड़े सहन, ऊँची छतें और लकड़ी नक्काशी वाले दरवाज़े दूर से ही उसकी शान बयान कर देते थे। घर के बाहर लगे चमेली और मोगरे के पौधे हर शाम अपनी खुशबू से पूरा माहौल महका देते। यह घर सिर्फ ईंट और पत्थरों का ढांचा नहीं था, बल्कि रिश्तों, मोहब्बतों और हँसी से आबाद एक दुनिया था। इस घर में शफीक़ साहब अपनी बेगम ज़ोहरा और दो बेटों असद अहमद और आसिम अहमद के साथ रहते थे।शफीक़ साहब और ज़ोहरा बेगम को हमेशा से एक बेटी की ...Read More
Muhabbat Ek Sabaq - 3
हैदराबाद पहुंचे तो एयरपोर्ट पर आमना बेगम का ड्राइवर पहले से मौजूद था, जो काफी पुराना और सब को भी था। आज भी आसिम साहब को देखते ही खुश हो गया।"कैसे हो शौक़त मियां ?",आसिम साहब ने लगेज बैग ड्राइवर को पकड़ाते हुए उससे हाल चाल पूछा।"बस आप सब लोगो की दुआएं है साहब जी।"ड्राइवर ने सामान गाड़ी में रखने के बाद अब उनके बैठने के लिए दरवाज़ा खोला।कार में बैठने के बाद आसिम साहब तो ड्राइवर से बातों में बिज़ी हो गए जबकि वह खिड़की से बाहर देखते हुए अनस के बारे में सोच रही थी जो आज ...Read More
Muhabbat Ek Sabaq - 4
“क्या बात है शिफ़ा काफी लेट हो आज???”,नादिया उसका इंतेज़ार करती गेट पर ही मिल गई। वह उसकी क्लास थी और क्लास की ज़हीन (Intelligent) लड़कियों में भी उसकी गिनती होती थी। और इसलिए ही शिफ़ा की उससे काफी दोस्ती भी हो गई क्योंकि बक़ौल अनस के वह अपने ही जैसे लोगो से दोस्ती करती थी किताबी कीड़ा टाइप।“हां यार अब चलो जल्दी सर अशफ़ाक़ ने सॉलिड वाली इज़्ज़त अफज़ाई (बेइज़्ज़ती) कर देनी है फिर!!!”,वह जल्दी-जल्दी क्लास रूम की तरफ क़दम बढ़ाती हुई बोली।“क्या बात है भई। शक्ल पर भी बारह बजे हुए है तुम्हारी तो, खैरियत???”,नादिया ने पूछा ...Read More
Muhabbat Ek Sabaq - 5
“क्या टाइम हो रहा है ???”,उसने थके थके से अंदाज़ मे बैग टेबल पर रखते हुए पूछा|मैडम राबेआ के से फ़ारिग़ हो कर वह दोनो अभी अभी कैंटीन आईं थीं|“बारह बज रहे हैं”,नादिया ने रिस्ट वॉच देखे बगैर ही बताया|“तुम्हारी आई साइट वीक हो गई हैं या तो फिर तुमहारी रिस्ट वॉच के सैल, क्योंकि एक बजे तो मैडम का पीरिएड होता है और आज तो उनहोंने एक्सट्रा टाइम लिया है”,उसने याद दिलाया|“मैं रिस्ट वॉच की नही तुम्हारी शक्ल की बात कर रही हूं”,नादिया समोसे और कोक का ऑर्डर देने के बाद अब उसकी तरफ मुतवज्जह हुई थी।“घर में ...Read More
Muhabbat Ek Sabaq - 6
“शिफ़ा बीबी, आपको छोटे साहब ने बुलाया है। वह कह रहे हैं आप किताबें ले कर लॉन में आ ने आकर इत्तेला दी।“ठीक है, तुम चलो आ रही हूं मैं”,उसने जवाब दे कर उसे जाने का इशारा किया|“हैरत है वैसे, मुझे तो लगा था कि मेरे कल के डंडा मारने वाले इंसीडेंट के बाद अब वह मेरी शक्ल भी नही देखेंगे पढ़ाना तो दूर रहा या फिर अपनी इंसल्ट का बदला लेने का इरादा होगा कल की। चल भई शिफ़ा हो जा रेडी इंसल्ट करवाने के लिये अपनी”,सोचती हुई वह किताबें और पैन उठा कर एक नज़र अपने हुलिये ...Read More
Muhabbat Ek Sabaq - 7
"लो जी हो गया हिटलर 2 का लैप्टाप स्टैबल",उसने नहा कर आने के बाद बाल सुखाते हुए ऐक नज़र पर डाली जहां विन्डो इन्स्टालेशन प्रौसेस पूरा हो चुका था।कंघा करने के बाद उसने थोड़े से बालों में कल्च लगा कर बाक़ी बालों को ऐसे ही खुला छोड़ दिया। फिर बेड पर पड़े टी शर्ट के मैचिंग दोपट्टे को सलीक़े के साथ ओढ़कर लैप्टॉप उठाए लॉन में आ गई, क्योंकि शहरयार इस वक़्त लॉन में ही होता था और उसका अंदाज़ा सही साबित भी हुआ ,वह वही था।"बात सुनें"!!!वह चाय पीने के साथ साथ मोबाइल पर कुछ देख रहा था ...Read More
Muhabbat Ek Sabaq - 8
अदील की मंगनी की तैयारियां ज़ोरो शोरो पर थीं कौसर बेगम कभी देवरानी तो कभी नन्द के साथ शॉपिंग बिज़ी थीं। उनका एक पैर घर में होता तो अगला बाज़ार में।घर का पहला फंकशन था इसलिये यंग जेनरेशन भी काफी एक्साइटेड थी।आज भी तीनो लेडीज़ दोपहर से बाज़ार गई हुई थीं। और ऐसे में सारी ज़िम्मेदारी शिफ़ा के उपर आ गई ,हालांकि मुलाज़िमा थी लेकिन खाना उसे खुद को ही बनाना था क्योंकि मुलाज़िमा के हाथ का खाना किसी को पसंद नही आता था अभी भी वह सबके लिये चाय बना कर लाउंज में ले आई जहां सारे कज़िन्ज़ ...Read More
Muhabbat Ek Sabaq - 9
आपी , दादु ने बुलाया है आप को”…. . …आज वह काफी देर से सो कर उठी थी इसलिये भी कमरे में ही मंगा लिया ,अभी नाशता कर ही रही थी कि हसन ने आ कर बताया“ठीक है आती हुं मैं , तुम चलो”…. .उसने हसन को जाने का इशारा किया।उसके जाने के बाद उसने जल्दी जल्दी नाशता खत्म किया और मॉसी को कमरे की सफाई का कह कर दादु के कमरे में चली आई।“जी दादु बुलाया आपने “??“हां , सब बच्चों ने अपनी अपनी शॉपिंग दिखा दी मुझे लेकिन तुमने नही दिखाई “???दादु ने कुछ नाराज़गी से पूछा“की ...Read More
Muhabbat Ek Sabaq - 10
तैयार हो कर रज़ा भाई को कॉल लगाने के बाद फोन कान से लगाते हुए उसने सामने लगे आईने अपना जायज़ा लियासही कहती हैं अम्मी मशरिक़ी लुक की बात ही कुछ और होती है ,अनस की च्वाइस वाक़ई ज़बरदस्त थी और ड्रैस उसे सूट भी बहुत कर रहा था ….वह आईना देखते हुए मुस्कुराने लगी"ओफ्फोह !!! क्या मुसीबत है कोई भी फोन रिसीव नही कर रहा है…. .. .वह पार्लर में तैयार होने आई थी और वापसी में रज़ा ने उसे पिक करना था लेकिन अब वह फोन ही नही रिसीव कर रहा था , उसने बारी बारी हसन, ...Read More