Muhabbat Ek Sabaq - 4 in Hindi Love Stories by Afariya Faruqui books and stories PDF | Muhabbat Ek Sabaq - 4

Featured Books
Categories
Share

Muhabbat Ek Sabaq - 4





“क्या बात है शिफ़ा काफी लेट हो आज???”,
नादिया उसका इंतेज़ार करती गेट पर ही मिल गई। वह उसकी क्लास फैलो थी और क्लास की ज़हीन (Intelligent) लड़कियों में भी उसकी गिनती होती थी। और इसलिए ही शिफ़ा की उससे काफी दोस्ती भी हो गई क्योंकि बक़ौल अनस के वह अपने ही जैसे लोगो से दोस्ती करती थी किताबी कीड़ा टाइप।
“हां यार अब चलो जल्दी सर अशफ़ाक़ ने सॉलिड वाली इज़्ज़त अफज़ाई (बेइज़्ज़ती) कर देनी है फिर!!!”,
वह जल्दी-जल्दी क्लास रूम की तरफ क़दम बढ़ाती हुई बोली।
“क्या बात है भई। शक्ल पर भी बारह बजे हुए है तुम्हारी तो, खैरियत???”,
नादिया ने पूछा तो शिफ़ा को वह शख्स याद आ गया था।
“हां एक अपडेटेड हिटलर से सामना हो गया था सुबह सुबह। सारा मूड खराब कर दिया”,
उसने जल कर बताया तो नादिया के लिए उसके दिए गए निक नेम पर हँसी ज़ब्त करना मुश्किल हो गया।
“किसकी शामत आ गई तुम्हारे हाथों सुबह सुबह???”,
नादिया ने उसका गुस्सा कम करना चाहा।
“बताउंगी बाद में,अभी क्लास में चलो तुम, क्योंकि सर अशफ़ाक़ भी जल्लाद के बहुत सगे है। हर वक़्त गुस्से में ही रहते हैं!!!”,
गुस्से में उसके मुंह से ऐसी ही मिसालें निकलती थी। नादिया सर झुकाकर मुस्कुराते हुए उसके साथ चलने लगी।

☆ ☆ ☆

आज सुबह से ही आसमान पर बादल छाए हुऐ थे। हल्की हल्की घटा और हवा के ठंडे झोंको ने मौसम को काफी खुशगवार बना दिया था। वह बुआ को नाशते का कह कर कमरे में जाने का इरादा कैंसिल करते हुऐ लॉन में चला आया।

अभी बैठने का इरादा कर ही रहा था कि नज़र साइड में पड़े विकर सोफे पर गई। जहां कोई बैठा पढ़ रहा था। कोई लड़की थी शायद, जिसकी पीठ उसकी अपनी तरफ होने की वजह से वह उसका चेहरा तो नही देख सका, लेकिन उसके खुले लम्बे बालों ने कुछ सेकिंड के लिए शहरयार को उलझा दिया था। जो सोफे की पुशत पर बिखरे हुए थे।

“सर्वेंटस की तो इतनी हिम्मत हो नही सकती कि यूं बेफिक्र हो कर बैठे तो फिर कौन हो सकती है?”,
सोचता वह लड़की के पीछे जा खड़ा हुआ। क़रीब ही था के उस को मुतवज्जह करता उसे खुद को एक ज़ोरदार छींक आई थी।
“आाााछीं”,
छींक इतनी ज़ोरदार थी कि वह खुद बुरी तरह शर्मिंदा हो गया, और अपनी किताबों में खोई शिफ़ा जो इस अचानक आने वाली मुसीबत से बिल्कुल अंजान थी। बहुत बुरी तरह डर गयी।
उसके हाथ में पकड़ी किताब भी ज़मीन पर गिर चुकी थी और अब वह खड़ी उसे अंगारे बरसाती निगाहों से घूर रही थी।
“मुझसे कोई पर्सनल मसला है आपको???”,
उसने लिहाज़ मुरव्वत ताक पर रख कर शहरयार अहमद को मुखातिब किया।
“कौन सा मसला???”
शहरयार ने कुछ ना समझने वाले अंदाज़ में उसकी तरफ देखा।
यह पहली लड़की थी जो उससे इस अंदाज़ में बात कर रही थी। वरना आज तक उसने बस यही देखा था कि लड़कियां उसकी अटैंशन पाने के लिये बात करने के बहाने ढूंढा करती थीं।
“यह तो आप बताएं कौन सा मसला है। आपको जो यूं मेरा हार्ट फेल कराने पर तुले हुए हैं आप, या फिर मैंने कौन सा आपकी प्रॉपर्टी अपने नाम करा ली है। जो मेरे मरने के बाद आपको मिलने वाली है इसीलिये आप यूं मेरी जान के पीछे पड़े हुए हैं”,
हमेशा की तरह गुस्से में उसके मुंह से औल फौल निकला था। जिस पर शहरयार का एक ज़ोरदार क़हक़हा जलती पर तीली का काम कर गया।
वह जलती भुनती पलट कर ज़मीन पर गिरी किताबें समेटने लगी।
“शहरयार बेटा, आपका नाशता…… “,
बुआ की आवाज़ पर उसने पलट कर देखा और उनसे ट्राली लेकर उनहें जाने का इशारा किया था।
“नाशता कीजिये मिस……”,
उसने कुछ देर पहले वाली तल्खी को भूल कर मेज़बानी निभाई।
“जज़ाक अल्लाह…. “,
वह लठ मार अंदाज़ में कह कर एक हाथ से किताबे और दूसरे हाथ से अपने बाल संभालती निकल गयी तो शहरयार भी सर झटक कर नाशते की तरफ मुतवज्जह हो गया ।

☆ ☆ ☆

“शिफ़ा ”, 
वह किताब सामने रखे कुछ पॉइंटस समझने की नाकाम कोशिश कर रही थी| फुप्पो की आवाज़ पर पलट कर देखने लगी।
“अरे फुप्पो आएं ना अंदर , वहा क्यों खड़ी हैं”, 
वह किताब बंद करती उठ कर उनकी तरफ आई थी।
“कुछ नही बस तुम्हें देखने आई थी| कहां हो? आज, सुबह तुमने नाश्ता भी कमरे में ही मंगवा लिया था| खैरियत तो है……... “,
उनहोंने फिक्रमंदी से पूछा|
“मैं ठीक हूं फुप्पो, आप फिक्र ना करे”,
वह थकी थकी सी उनकी गोद में सर रख कर लेट गयी|
“क्या हुआ, तबियत ठीक नही लग रही आज मुझे तुम्हारी”,
वह उसके बिखरे बाल समेटते हुए मुहब्बत और परेशानी से पूछने लगी, तो उसे बेसाख्ता उन पर ढेर सारा प्यार आया था।
“तबियत ठीक है! बस एक प्रेज़ेंटेशन की टेशन हो रही है| जो मन्डे में कॉलेज में देनी है और मुझे टॉपिक्स ही क्लीयर नही हो रहे| प्रेज़ेंटेशन क्या खाक़ दूंगी”,
वह परेशानी से बोली|
“तो इस में इतना परेशान होने की क्या बात है , मैं शहरयार से कह देती हूं| वह गाइड कर देगा तुम्हे” ….”,
फुप्पो ने उसका मसला हल कर दिया।
“कर ही ना दें मुझे गाइड वह हिटलर की जीरॉक्स”,
उसने जल कर सोचा|
“क्या सोचने लगीं???”
” कुछ नही फुप्पो, बस रहने दें| आप उनको परेशान ना करें| मैं कर लूगीं मैनेज खुद”

उसने बात तो सहज अंदाज़ में कही, लेकिन दिल पूरी तरह मुतमइन नहीं था। प्रेज़ेंटेशन का दबाव अपनी जगह था और ऊपर से किसी दूसरे की मदद लेना भी उसे आसान नहीं लगता था। खास तौर पर ऐसे इंसान से, जिसके साथ दो मिनट की बातचीत भी उसकी झुंझलाहट बढ़ा देती हो।

“क्यों रहने दूं भई , उसका इसी फील्ड में पी° एच° डी° करने का क्या फायदा हुआ फिर , अगर घर के घर में वह तुम्हारी हैल्प ना कर सके”,

फुप्पो किसी सूरत मानने को तैयार न थीं|

“अच्छा ठीक है कर लीजियगा बात”,

वह मुंह बनाती उठ खड़ी हुई।
“बेगम साहिबा आपको बड़े साहब बुला रहे हैं रूम मे अपने”,
मॉसी ने आ कर बताया।
“तुम फ्रैश हो कर नीचे आओ फटाफट, मैं टेबल पर वेट कर रही हूं तुम्हारा| शेरी से भी आज ही कहती हूं| शाम में कुछ वक़्त दे दिया करे तुम्हें”,
फुप्पो उसे कहती उठ खड़ी हुईं तो वह भी हां मे सर हिला कर वार्डरोब की तरफ बढ़ गई।
☆ ☆ ☆

Afariya Faruqui के novel ऑडियो बुक्स में हमारे यूट्यूब चैनल पर मौजूद है। ऑडियोबुक एंजॉय करने के लिए Youtube पर हमारे चैनल Afariyas Podcast को सब्सक्राइब करें।