हवेली से दफ्तर तक

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सोने का पिंजरा हवेली बड़ी थी। इतनी बड़ी कि गौरी को बचपन में लगता था कि अगर वह एक कने से दौड़ना शुरू करे, तो साँस फल जाएगी दूसरे कोने तक पहुँचने से पहले। सेठ धरमचंद की इकलौती बेटी। बाईस साल की। नौकर चाकर, गाड़ी बगला, सब कुछ था जो पैसा खरीद सकता था। रश्तेदार आते, जाते, और एक ही बात कहते, “धरमचंद की बिटिया तो रानी बेटी है।” सबह मंदिर की घंटी से दिन शुरू होता। दोपहर में मेहमानों की चाय पानी, शाम को कभी संगीत, कभी कोई रस्म। घर सँभालना गरी को बचपन से सिखाया गया था, किस बरन में क्या पकता है, कौनसा रिश्तेदार किस बात पर नाराज़ हो जाता है, सब उसकी ज़ुबन पर था। पर रात के ग्यारह बजे, जब हवेली सोती, एक और गौरी जागती थी। उसके कमरे के एक कोने में, पुराने अलमरी के पीछे, एक छोटा टेबल लैप था। रोशनी इतनी कम कि बाहर गली से दिखे ना। सामने मोटी मोटी किताबें खुली होती, देश का इतिहास, कानून की धाराएँ, अर्थशास्त्र के सिद्धांत। पन्ने पलटने की आवाज़ भी वह धीरे से करती, जैसे कोई राज़ छुपा रही हो।

Full Novel

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हवेली से दफ्तर तक - 1

अध्याय 1: सोने का पिंजराहवेली बड़ी थी। इतनी बड़ी कि गौरी को बचपन में लगता था कि अगर वह कने से दौड़ना शुरू करे, तो साँस फल जाएगी दूसरे कोने तक पहुँचने से पहले।सेठ धरमचंद की इकलौती बेटी। बाईस साल की। नौकर चाकर, गाड़ी बगला, सब कुछ था जो पैसा खरीद सकता था। रश्तेदार आते, जाते, और एक ही बात कहते, “धरमचंद की बिटिया तो रानी बेटी है।”सबह मंदिर की घंटी से दिन शुरू होता। दोपहर में मेहमानों की चाय पानी, शाम को कभी संगीत, कभी कोई रस्म। घर सँभालना गरी को ...Read More

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हवेली से दफ्तर तक - 2 - 3

अध्याय 2: पुस्तकालय और लड़काज़िला पुस्तकालय हवेली से तीन किलोमीटर दूर था। पुरानी इमारत, टूटी सीढ़ियाँ, पंखे जो आवाज़ हुए चलते थे। पर गौरी के लिए वह पूरी दुनिया थी।वह हफ़्ते में दो बार जाती, बहाना बना कर, “मंदिर जा रही हूँ” या “सहेली से मिलने।” ड्राइवर को छुट्टी दे देती, पैदल जाती। कोई पूछता तो कहती घूमने निकली थी।वहीं उसकी मुलाक़ात आरव से हुई।कुर्ता पजामा, हवाई चप्पल, आँखों में एक आग जो गौरी ने पहले कभी किसी में नहीं देखी थी। उसके बाबा मज़दूर थे, गुज़र गए थे जब आरव बारह साल का ...Read More

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हवेली से दफ्तर तक - 4 - 5

अध्याय 4: तूफ़ान...सुबह हवेली में एक अजीब सी खामोशी थी। नौकर इधर उधर घूम रहे थे, पर कोई किसी नहीं बोल रहा था। गौरी जानती थी कि ये तूफ़ान से पहले की शांति है।बुआ सुबह सुबह धरमचंद के कमरे में गई थीं, दरवाज़ा बंद करके। आधे घंटे बाद धरमचंद बाहर निकले, चेहरे पर वह सख़्ती जो गौरी ने पहले कभी नहीं देखी थी।“गौरी को बुलाओ,” उन्होंने नौकर से कहा, आवाज़ ठंडी, बर्फ़ जैसी।गौरी बैठक में आई तो पूरा परिवार वहाँ बैठा था। माँ एक कोने में सिर झुकाए, बुआ अपनी ...Read More

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हवेली से दफ्तर तक - 6 - 7

अध्याय 6: बुख़ारअक्टूबर की शुरुआत थी जब आरव को पहली बार बुख़ार आया। छोटा सा, सिर्फ़ एक या दो का, या कम से कम वो ऐसा सोचता था।“बस थकान है,” उसने कहा, जब गौरी ने चिंता जताई। “परीक्षा से पहले ऐसा होता है।”पर बुख़ार नहीं गया। तीन दिन बाद भी वह 39 डिग्री पर था, और आरव की साँस तेज़ हो गई थी। गौरी ने पहली बार असली डर महसूस किया।“अरे, ये तो ठीक नहीं है,” आरव की माँ ने कहा, उसके माथे पर हाथ रख कर। “हम डक्टर के ...Read More

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हवेली से दफ्तर तक - 8 - 9

अध्याय 8: इम्तहानजनवरी आया, और गौरी के साथ परक्षा का वो समय भी आया जो वह हमेशा से चाहती पर अब उसका सद बदल गया था। हर सपना अब आरव की याद में डूबा हुआ था।परीक्षा हल में बैठते समय, गौरी ने डायरी निकाली जो वह अपने साथ लाई थी, और आरव के एक नट को देखा जो उसने आख़िरी दिनों में लिखा था:“गौरी, तुम ये परीक्षा पास करोगी। तुम्हरे पास जो ताक़त है, वो किसी में नहीं है। न सिर्फ़ किताबों की, बल्कि ज़िंदगी की। जाओ, और जीतो। मेरी ...Read More